Monday, April 30, 2018

बुध्द पूर्णिमा संदेश

🌹🌻🌹

#आज_बुद्ध_पूर्णिमा_है

आजकी विशेष बोध कथा

*कालिदास बोले :-* माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.

*स्त्री बोली :-* बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो।
मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

*कालीदास ने कहा :-* मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।

*स्त्री बोली :-* तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।

*कालिदास ने कहा :-* मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

*स्त्री बोली :-* तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।
पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?
.
(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)
*कालिदास बोले :-* मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

*स्त्री ने कहा :-* नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)
*कालिदास बोले :-* मैं हठी हूँ ।
.
*स्त्री बोली :-* फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?

(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)
*कालिदास ने कहा :-* फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।
.
*स्त्री ने कहा :-* नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।
मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)

*वृद्धा ने कहा :-* उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

*माता ने कहा :-* शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।
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कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

शिक्षा :-

विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।
दो चीजों को कभी *व्यर्थ* नहीं जाने देना चाहिए.....

*अन्न के कण को*
         "और"
*आनंद के क्षण को*

Wednesday, April 25, 2018

घरेलू आयुर्वेदिक उपाय.

शरीरमें खून तथा हेमोग्लोबिन बढाने तथा शक्ति पानेके उपाय...

1. दो घंटे के लिए 2 चम्मच तिलों को पानी में भिगों लें और बाद में पानी से छानकर इसका पेस्ट बना लें। अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं और दिन में दो बार सेवन करें।

2. काफी और चाय का सेवन कम कर दें। एैसा इसलिए क्योंकि ये चीजें शरीर को आयरन लेने से रोकते हैं।

3. दो बार दिन में ठंडे पानी से नहाएऔर सुबह नहाने के बाद सूरज की रोशनी में बैठें।

4. आप अपने भोजन में गेहूं, मोठ, मूंग और चने को अंकुरित करके उसमें नींबू मिलाकर सुबह का नाश्ता लें।

5. पके आम के गुदे को मीठे दूध के साथ सेवन करें। एैसा करने से खून तेजी से बढ़ता है।

6. शरीर में खून की कमी को दूर करने के लिए मूंगफली के दानों को गुड़ के साथ चबा-चबा कर सेवन करें।

7. सिंघाड़ा शरीर में खून और ताकत दोनो को बढ़ाता है। कच्चे सिंघाड़े को खाने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर तेजी से बढ़ता है।

8. मुनक्का, अनाज, किशमिश, दालें और गाजर का नियमित सेवन करें और रात को सोने से पहले दूध में खजूर डालकर उसको पीएं।

9. अमरूद, पपीता, चीकू, सेब और नींबू आदि फलो का अधिक से अधिक सेवन करें।

10. आंवले का रस और जामुन का रस बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है।

11. एक गिलास टमाटर का रस रोज पीने से भी खून की कमी दूर होती है। इसलिए टमाटर का सूप भी बनाकर आप ले सकते हो।

12. बथुआ, मटर, सरसों, पालक, हरा धनिया और पुदीना को अपने भोजन में जरूर शामिल करें।

13. फालसे का शर्बत या फालसे का सेवन सुबह शाम करने से शरीर में खून की मात्रा जल्दी बढ़ती है।

14. शरीर में खून को बढ़ाने के लिए नियमित रूप से लहसुन और नमक की चटनी का सेवन करे। यह हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करता है।

15. सेब का जूस रोज पीएं। चुकंदर के एक गिलास रस में अपने स्वाद के अनुसार शहद मिलाकर इसे रोज पीएं। इस जूस में लौह तत्व ज्यादा होता है।

शरीर में खून की कमी से बहुत बीमारियां लग सकती हैं। जिस वजह से इंसान कमजोर हो जाता है और उसका शरीर बीमारियों से लड़ नहीं पाता है। इसलिए महिलाओं और पुरूषों को शरीर में खून की मात्रा बढ़ाने के लिए इन आयुवेर्दिक उपायों को अपनाना चाहिए।
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Tuesday, April 24, 2018

પુસ્તક વિમોચન

🌹 *शब्द संवाद*🌹

     *આમંત્રણ*

🌺  *પુસ્તક વિમોચન* 🌺

🌻 *શબ્દ સંવાદ* સાથે જોડાયેલા બધા કવિમિત્રો, ગઝલકારો, સાહિત્યકારો અને સાહિત્ય પ્રેમી મિત્રો ને  *શબ્દ સંવાદ* દ્વારા આપણા પ્રમુખ શ્રી *ચંદૂ મહેસાનવી - મુન્સિફ* નાં *પુસ્તક વિમોચન  સમારંભ* માં પધારવા ભાવ સભર આમંત્રણ છે. આપ સાથે પોતાના કવિ મિત્રોને પણ લાવી શકો છો.

🌻  🌻  🌻

મુખ્ય અતિથિ :- *શ્રી વિષ્ણુ પંડ્યા*
             *અધ્યક્ષ* :- ગુજરાત સાહિત્ય એકેડેમી
         *પદ્મ એવોર્ડ પુરસ્કૃત*

વિશેષ ઉપસ્થિતિ :- *શ્રી અશોક દવે*
                  (હાસ્ય લેખક)
              *શ્રી ઈબહામ રશિદ*
                  (ઉર્દૂ શાયર)

દિનાંક...
28 *એપ્રિલ* 2018
*શનિવાર*

સમય..
*સાંજે  05.15* કલાકે

સ્થાન..
*એમ. જે. લાઈબ્રેરી*
  *સભા ખંડ*
    આશ્રમ રોડ
    અમદાવાદ

*બહાર ગામનાં કવિઓને પણ આમંત્રણ છે*

*નોંધ*  શબ્દ સંવાદ સાથે સંકળાયેલા કવિઓ નાં કાવ્યપઠનનો કાર્યક્રમ શરૂઆત માં રહેશે...

🌻

*મહેન્દ્રભાઈ  રાવલ*
        સંયોજક
    *શબ્દ સંવાદ*

Friday, April 20, 2018

Six Darshan and BrahmSutra

Brahmasutra & six Indian Philosophy
There are six systems of Indian philosophy which uphold the authorities of Vedas.These are Nyaya, Vaisheshika, Sankhya, Yoga,Purva Mimansa & Utter Mimansa. ThevJain & Buddhist schools of thought do not recognizes the supremacy of Vedas.
Out of these 6 darshans one is Brahma Sutras known as Badarayan Sutra, Utter Mimansa or Bhikshu Sutras.It is the last one among shad darshans which tell a lot of Upanishadic philosophy which reject the conclusions of all others like Buddha & Jain philosophy. In this connection we have to remember that each of the systems of philosophy has its distinct world view, trying to find out answers to the fundamental questions of philosophy such as where this world has been emanated, how it has come to present shape or structure and how it is functioning. All these basic questions are being discussed in each in a separate manner to find out an answer or answers which may or may not be liked by all.

Wednesday, April 18, 2018

अक्षय तृतीया परशुराम जयंती

।  आक्षय तृतीया  ।

       ।  परशुराम जयंती  ।

भृगुदेव कुलं भानुं, सहस्रबाहुर्मर्दनम्।
रेणुका नयनानंदं, परशुं वन्दे विप्रधनम्।।

◆◆◆◆जय जय परशुराम◆◆◆◆

भगवान विष्णु के छठें अवतार,विप्रश्रेष्ठ ,सत्य के साधक,अजर अमर भगवान परशुराम जी की जन्मोउत्सव  "अक्षय तृतीया" की आप सभीको हार्दिक शुभकामनाएं।

मैं परशुराम बोल रहा हूँ...
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मैं, तुम्हारा पूर्वज,
परशुराम बोल रहा हूँ...
अपने जीवन के कुछ,
रहस्य खोल रहा हूँ ...

माँ रेणुका, पिता जमदग्नि
ये सब जानते हैं
विष्णु का छठा अवतार
मुझे सब मानते हैं ...

मैं भृगु वंश में जन्मा
पितामह त्रिकालदर्शी थे
भृगुसंहिता के प्रणेता
दिव्यदृष्टि वाले महर्षि थे

पांच भाइयों में सबसे छोटा
घर भर का दुलारा था
माँ- बाप ने ‘राम’ कहा
जग ने परशुराम पुकारा था...

मेरे आगमन का ध्येय विशेष
मैं विष्णु का आवेशावतार था
मिथ्या दंभ से धरा तप्त थी
मेरा कर्म उद्दंडियों का संहार था...

नानी के छल के कारण
मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा था
ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियत्व
मेरी रगों में पनपा था...

परम विदुषी माँ रेणुका ने
सर्वप्रथम मुझे ज्ञान दिया था
आज्ञापालन और प्रकृति प्रेम का
बेशकीमती संज्ञान दिया था...

विश्वामित्र मेरे परम गुरु
ऋचीक आश्रम विद्यास्थली रहा
शिव ने सिखाया रण मुझे
इसीलिए तो मैं महाबली रहा...

महामनाओं की कृपा मुझ पर
अनंत और अनवरत रही
दिव्य शस्त्र और दिव्य मंत्र मिले
तन पर अभेद परत रही...

विद्युदभि नामक विशाल फरसा
श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच,
शिव गुरु ने प्रदान किया था
स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु
के साथ साथ महादेव ने मुझे
सहृदयता से विद्यादान दिया था...

चक्रतीर्थ में मेरे कठिन तप ने
विष्णु को प्रसन्न कर दिया था
उन्होंने मुझे कल्पान्त पर्यन्त
भूलोक पर रहने का वर दिया...

क्षणिक कमजोरी के वशीभूत
माँ ने एक पाप किया था
परपुरुष पर मोहित होने का
पिता ने बहुत संताप किया था...

पितृ आदेश से मैंने फिर
माँ-भ्राताओं का वध कर डाला
आज्ञा पालन से अभिभूत पिता ने
मुझे स्नेहिल बाहों में भर डाला...

कोमल हृदय पिता ने मुझे
बहुमूल्य वरदान दिया था
मेरी याचना पर माँ-भ्राताओं को
फिर से जीवन दान दिया था...

हैहय वंशाधिपति का‌र्त्तवीर्यअर्जुन
सहस्त्रार्जुन कहलाया था
दत्तात्रेय को तप से प्रसन्न कर
हजार बाहुओं का वर पाया था...

बड़ी शक्ति ने सहस्त्रार्जुन को
स्वेच्छाचारी बना दिया था
उसने वो हर काम किया
जिसके लिए उसे मना किया था ...

सहस्त्रार्जुन के आश्रम प्रवास पर
पूज्य पिता ने उपकार किया था
सैन्यबल सहित राजा का
भरपूर अतिथि सत्कार किया था ...

कामधेनु कपिला के प्रताप से
धनधान्य भरपूर था
आश्रम का वैभव देखकर
राजा का दर्प चकनाचूर था ...

कपिला को हड़प जाने को
सहस्त्रार्जुन ललचाया था
चोरी जैसे नीच कर्म पर
‘प्रजापालक’ उतर आया था ...

इस बलात हरण का तब मैंने
पुरजोर प्रतिकार किया था
फरसे से हजार भुजाएं काट डाली
लुटेरे का संहार किया था...

मेरी अनुपस्थिति में राजपुत्रों ने
ध्यानस्थ पिता की हत्या कर दी
इस कायरतापूर्ण कुकर्म ने मन में
ऐसे क्षत्रियों के प्रति जुगुप्सा भर दी ...

माँ रेणुका सती हो गईं
पल में मैंने माँ- बाप खो दिए थे
इस अपूरणीय क्षति ने
भावी हाहाकार के बीज बो दिए थे ...

मेरे जीवन का एकमेव ध्येय
मातृभूमि का उपचार करना था
फरसे के प्रहार से पापियों का
पापयुक्त दूषित जीवन हरना था...

इक्कीस बार भू  को मैंने
पापीयों से विमुक्त किया था
जगत वन्दनीय धरा को
आततायी रक्त से सिक्त किया था ...

अहा!! कैसा रक्तिम समय वह
कितना प्रचंड दौर था
दसों दिशाओं में त्राहि त्राहि का
खूब मर्मान्तक शोर था ...

पांच सरोवर दूषित रक्त से
मैंने सराबोर किये थे
सहस्त्रार्जुन सुतों के रक्त से
पिता के श्राद्ध घनघोर किये थे ...

अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण कर
अपनी शक्ति का जग को भान दिया
सप्तद्वीप युक्त भूमंडल
फिर महर्षि कश्यप को दान दिया ...

महर्षि ऋचीक प्रकट हुए
उन्होंने मुझे शांत किया था
शस्त्र त्याग कर फिर मैंने
महेंद्र पर्वत पर विश्राम किया था ...

मुझसे शस्त्र विद्या सीखने
कईं विभूतियाँ आती रहीं
भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसी हस्तियाँ
मुझसे ज्ञान पाती रहीं ...

पशु-पक्षियों का और मेरा
आपस में बहुत प्यार था
उनके संग संततियों सा मेरा
प्रेमपूर्ण भावुक व्यवहार था ...

काव्य से प्रेम था मुझे मैं,
शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र का रचनाकार रहा
मेरे द्वारा रचित परशुराम गायत्री
इच्छित फल पाने का अचूक आधार रहा...

स्त्री स्वातंत्र्य का पक्षधर मैं
मैंने बहु पत्नी विवाह पर आघात किया
अनसूया  लोपामुद्रा के सहयोग से
नारी-जागृति-अभियान का सूत्रपात किया ...

आज अक्षय तृतीया है
तुम मेरा जन्मदिन मनाओगे
मेरी जीवन गाथा
तुम सभी को सुनाओगे....

मेरा आशीष है तुमको
ज्ञानवान बनो विद्यादान करो
सुसुप्त पड़ी हैं शक्तियां
अपनी क्षमता की पहचान करो।

🌹

।।जय परशुराम।।
जय श्री राम !!!

Wednesday, April 11, 2018

શું આપ મુશ્કેલીમાં મુકાયા છો...?

તકલીફમાં હોવ તો આ મેસેજ એક થી બેવાર જરૂર વાંચો.....

#શ્રીકૃષ્ણ ભગવાન ની કથા, એમ કહે છે કે, તેઓ *જન્મ્યા* પહેલાજ તેમને *મારી નાખવાની* તૈયારી થઇ ગયી હતી.

         પણ તેમાંથી તેઓ *આબાદ* ઉગરી ગયા આગળ તેમના જીવન માં ઘણા *સંકટો* આવ્યા પણ તેઓ *લડતા* રહ્યા કોઈ ને કોઈ *યુક્તિ* કરીને હંમેશા બચતા રહ્યા.

          કોઈ *પ્રસંગ* માં તો તેઓ *રણ* છોડી ભાગી પણ ગયા હતા,

         પણ મારા *જીવન* માં આટલી બધી *તકલીફો* કેમ છે કરી ને તેઓ કોઈ દિવસ પણ કોઈ ને પણ પોતાની *જન્મકુંડળી* બતાવવા નથી ગયા કે એવી કોઈ નોધ મેં નથી વાચી,

           ના કોઈ *ઉપવાસ* કર્યા, ના *ખુલ્લા પગે* ક્યાંય ચાલવા ની *માનતા* કરી, કે કોઈ *માતાજી ના ભુવા* પાસે *દાણા* જોવડાવ્યા,

મારે આ પ્રસંગ યાદ રાખવા જેવો ને વિચારવા જેવો છે.

તેમણે તો *યજ્ઞ* કર્યો તે ફક્ત અને ફક્ત *કર્મોનો*.

યુદ્ધ ના મૈદાન માં જયારે અર્જુને ધનુષ્ય બાણ નીચે નાખી દીધા,

        ત્યારે ભગવાન *શ્રીકુષ્ણ* એ ના તો અર્જુન ના *જન્માક્ષર* જોયા, ના તો તેને કોઈ *દોરો* કે *તાવીજ* તેને આપ્યા,
આ તારું યુદ્ધ છે અને તારેજ કરવાનું છે એમ અર્જુન ને સ્પષ્ટ કહી દીધું,

અર્જુને જયારે ધનુષ્ય નાખી દીધું ત્યારે તે ધનુષ ઉપાડી ભગવાને અર્જુન વતી લડાઈ નથી કરી।

       બાકી *શ્રીકુષ્ણ* ભગવાન ખુદ *મહાન યોદ્ધા* હતા.
તેઓ *એકલા હાથે* આખી *કૌરવો ની સેના* ને હરાવી શકે તેમ હતા,પણ ભગવાને *શસ્ત્ર* હાથ માં નહોતું પકડ્યું પણ જો અર્જુને લડવાની તૈયારી બતાવી તો તેઓ તેના *સારથી ( માર્ગદર્શક )* બનવા તૈયાર હતા.

         આ રીતે ભગવાન *શ્રીકૃષ્ણ* મને સમજાવે છે કે જો દુનિયા ની તકલીફો માં તું જાતે લડીશ તો હું હંમેશા તારી આગળ ઉભો હોઈશ.

તારી *તકલીફો* ને હું હળવી કરી નાખીશ અને તને *માર્ગદર્શન* પણ આપીશ,

કદાચ આજ *ગીતા* નો સહુથી સંક્ષિપ્ત *સાર* છે.

જયારે હું પ્રભુ સન્મુખ થાવ ત્યારે ભગવાન ને એટલીજ વિનંતી કરું કે ભગવાન મારી *તકલીફો* થી લડવાની મને *શક્તિ* આપજો,

નહિ કે ભગવાન મારી *તકલીફો* થી *છુટકારો* આપજો,

ભગવાન મારી પાસે *ઉપવાસ* નથી માંગતા,
નહિ કે તું *ચાલતો* આવ કે બીજું કઈ,

ભગવાન માંગે છે તો મારુ *સ્વાર્થ વગર નુ કર્મ*,....

માટે મારે *કર્મ* કરતા રહેવું.

અને કોઈ શું કહેશે તેની ચિંતા કરવી નહીં..

ભગવાન બધા સારા વાના કરશે....

   

અંતે તો પરમાત્માનું શરણ જ સત્ય છે

‘સમય સમય બલવાન હૈ; નહીં પુરૂષ બલવાન’ એ ઉક્તિને વધુ એક વખત સાચી ઠેરવતી ત્રણ ઘટનાઓ તાજેતરમાં ભારતમાં બની જેનાથી સંવેદનશીલ લોકો હચમચી ગયા છે:

(૧). એક સમયે, રૂ. ૧૨ હજાર કરોડના બીઝનેસ સામ્રાજ્ય અને સુવિખ્યાત ‘રેમન્ડ’ બ્રાન્ડના માલિક શ્રી વિજયપત સિંઘાણીયા આજે ભાડાંના મકાનમાં રહે છે અને ખાવાના પણ સાંસા પડી ગયા છે. સ્વમાલિકીનું એક ટચૂકડું વિમાન પોતાની જાતે ઉડાડીને, લંડનથી ભારત સુધીની સફર એકલા ખેડવાના ‘રેકોર્ડ’ના સર્જક, ‘હોટ એર બલૂન’માં જમીનથી ૬૯,૮૫૨ ફૂટની ઊંચાઈ આંબવાના વિશ્વ-વિક્રમના સ્થાપક, મુંબઈના શેરીફ્નું પ્રતિષ્ઠિત પદ શોભાવનાર, ભારતના ટોચના ધનિકોમાંના એક અને રાષ્ટ્રના ત્રીજા ક્રમના સર્વોચ્ચ નાગરિક સન્માન ગણાતા ‘પદ્મભૂષણ’થી વિભૂષિત એવા ખ્યાતનામ ઉદ્યોગપતિ શ્રી વિજયપત સિંઘાણીયાએ તેમની આજની સ્થિતિ માટે પોતાના સગા દીકરાને જવાબદાર ઠેરવ્યો છે; એક ટીવી ‘ઈંટરવ્યૂ’માં તેને ‘નાલાયક પુત્ર’ ગણાવ્યો છે. પુત્ર-પ્રેમમાં અંધ બનીને વિજયપતજીએ પોતાનું સર્વસ્વ પુત્રના નામે કરી દીધું અને એ ‘કપાતરે’ આવા હોનહાર બાપને જ ઘરમાંથી તગેડી મૂક્યો.

(૨). મુંબઈના એક અત્યંત વૈભવી વિસ્તારમાં રહેતી એક અબજોપતિ મહિલા પોતાના ફ્લેટમાં મૃત્યુ પામી ત્યાં સુધી અને તે પછી પણ તેના દીકરાએ સગી મા, જનેતાની ભાળ કાઢી નહીં; મૃત્યુના એક વર્ષે આ મહિલાનો હાડપિંજરમાં ફેરવાઈ ગયેલો મૃતદેહ તેના ફ્લેટમાંથી મળી આવ્યો. પેટનો જણ્યો ય પોતાનો થયો નહિ એવી પીડા સાથે આ મહિલાએ કઈ રીતે દેહ છોડ્યો હશે તેની કલ્પના કરતાં ય શરીરમાંથી લખલખું પસાર થઇ જાય તેવી આ બિના છે.

(૩). બિહારના બક્ષર જીલ્લાના કલેકટર, યુવાન આઇએએસ અધિકારી મુકેશકુમાર પાંડેએ ગઈ તા. ૧૦-૦૮-૨૦૧૭ના રોજ ટ્રેનની આડે પડતું મૂકીને આત્મહત્યા કરી લીધી. ગૃહકંકાસને કારણે તેમણે આ અંતિમ પગલું ભર્યાનું બહાર આવ્યું છે. આખા જીલ્લાનો વહીવટ સંભાળતો આ ઉચ્ચ અધિકારી પોતાના ઘરને સંભાળી શક્યો નહીં; જિંદગીથી હારી ગયો.

ઉપરોક્ત ત્રણેય ઘટના શું સૂચવે છે? પદ, પૈસો અને પ્રતિષ્ઠા ગમે તેવા અને ગમે તેટલા હોય; દરેક માનવીને સુખ આપી શકતા નથી. સંજોગો સામે માનવી કેટલો લાચાર છે તેના આ જીવંત દાખલા છે, આવી વધુ એક ઘટના પર દ્રષ્ટિપાત કરીએ:

કાર રેસીંગના ક્ષેત્રે વિશ્વ-વિખ્યાત સ્પર્ધા ‘ફોર્મ્યુલા-વન’ના મહાન, જવાંમર્દ ડ્રાઈવર માઈકલ શુમેકરથી કોણ અજાણ્યું હશે? ૯૧ ગ્રાન્ડપ્રિક્સનો જીતનાર અને સાત વખત વિશ્વ-ચેમ્પિયન બનેલો માઈકલ આજે જીવન-મરણ વચ્ચે ઝોલાં ખાઈ રહ્યો છે. ‘સ્પીડ’, ઝડપ, ગતિ જેની નસેનસમાં દોડતી હતી તે બત્રીસ લક્ષણો આજે પોતાની જાતે પડખું ફેરવી શકવા પણ સક્ષમ રહ્યો નથી. ૨૦૧૩માં બરફ પર રમાતી ‘સ્કીઈંગ’ની રમત દરમિયાન સર્જાયેલી દુર્ઘટનામાં માઈકલના માથામાં ગંભીર ઈજા પહોંચી અને સદાને માટે તેની જિંદગી બદલાઈ ગઈ. માઈકલની સારવાર માટે અત્યાર સુધીમાં ૧૪ મિલિયન યુરો (એક અબજ રૂપિયાથી વધુ)નો ખર્ચ થઇ ચૂક્યો છે અને તેની પત્ની આજે મિલકતો વેચીને પતિની સારવાર કરાવી રહી છે.

આવી ઘટનાઓ માનવીને એવો સ્પષ્ટ સંદેશ આપી રહી છે કે, જીંદગીમાં એકપણ સંજોગ પર તમારો કોઈ અંકૂશ નથી માટે સત્તા, પદ, પૈસા અને પ્રતિષ્ઠાનું લેશ માત્ર અભિમાન પણ કરવું નહિ. ક્યારે આ બધું તમારો સાથ છોડી દેશે તે નક્કી નથી. માટે, જીવન છે ત્યાં સુધી પરમ કૃપાળુ પરમાત્માનો ઉપકાર માનીને શાંતિથી જીવીએ.

અંતે તો પરમાત્માનું શરણ જ સત્ય છે...

Sunday, April 8, 2018

मोक्षका मार्ग - अध्यात्म

पंच कोष ( मोक्ष का विज्ञान )

मानीवय सरंचना को सामान्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जाता है :-
पहला स्थूल शरीर ,
दूसरा सुक्ष्म शरीर।
यदि अधिक गहराई में मानवीय संरचना का विवेचन करना हो तो तीन शरीर कहे जाते हैं:-
पहला-स्थूल शरीर
दूसरा-सूक्ष्म शरीर
तीसरा-कारण शरीर।
यदि मानवीय संरचना का और अधिक गहन अध्ययन करना चाहें तो ऋषि पंच कोष की बात करते हैं ! इन पंच कोषों से मिलकर ही तीन शरीरबनते है। स्थूल शरीर के अंतर्गत अन्नमय कोष आता है। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत प्राणमय व मनोमय कोष आते है। कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय व आनंन्दमय कोष आते हैं!

प्राणमय कोष - प्राणि जगत का अर्थ प्राणमय कोष से है प्राणमय कोष होने के कारण ही वो प्राणी या प्राणधारी कहलाते हैं। अंत समय में प्राण निकलने का अर्थ है प्राणमय कोष का अन्नमय कोष से संबध टूटजाना। प्राणमय कोष का कार्य है अन्नमय कोष का संचालन। जब प्राणमय कोष अन्नमय कोष का संचालन बंद कर देता है तो अन्नमय कोष की सारी गतिविधियाँ रूक जाती है क्योंकि प्राणमय कोष एक प्रकार की उर्जा का भण्डार है जो स्थूल शरीर को चलाती है।जिस प्रकार विद्युत प्रवाह रूकने पर बिजली का उपकरण कार्य करना बंद कर देता है उसी प्रकार प्राणशक्ति के अभाव में स्थूल शरीर के विभिन्न अंग उर्जा विहिन होकर  बेकार हो जाते हैं। जो लोग प्राणमय कोष को ध्यान के माध्यम से देख सकते हैं अथवा अनुभव कर सकते हैं उन्हे बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है। प्राणमय कोष पर नियन्त्रण करना जो लोग जानते हैं वो तरह-तरह के चमत्कार दिखा सकते हैं जैसे इच्छा मृत्यु का वरण, रोगमुक्ति, जमीन के भीतर जड़ समाधि में चले जाना आदि-2। हृदय गति, नाड़ी गति,रक्तचाप आदि को तिब्बत के लामा कम ज्यादा करने के चमत्कार दिखाते हैं वह इसी प्राणमय कोष की सिद्धि से सम्भव है।प्राणमय कोष को सशक्त, संतुलित बनाना प्रत्येक प्राणधारी का कर्तव्य है। विविध प्रकार के श्वास-प्रश्वास के प्रयोग बन्धमुद्राए, अस्वाद व्रत इत्यादि से प्राणमय कोष को जाग्रत किया जा सकता है।

मनोमय कोष:-  जिसमें मनोमय कोष विकसित हो उसे मानव कहा जाता है प्रत्येक प्राणी के गुण धर्म स्वभाव मनोमय कोष के अंर्तगत आते है यदि पाश्चात्य विचारधार अथवा आधुनिक मनीषियों के अनुसार मनोमयकोष का  विवेचन किया जाए तो मनोमयकोष के दो भाग हैं पहला अवचेतन मन व दूसरा चेतन मन। अवचेतन मन तीन प्रकार की (सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी) वृित्तयों, संस्कारों का संग्रह है। व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके अवचेतन मन पर निर्भर करता है यदि अवचेतन मन में भय भरा है तो व्यक्ति व्यर्थ में भयभीत होता रहेगा , यदि लालच भरा है तो लालची होगा, यदि करूणा भरी है तो दयालु होगा। व्यक्ति की प्रकृति का निर्धारण व्यक्ति के अवचेतन मन के आधार पर होता है। चेतन मन के आधार पर वह सही या गलत का निर्णय लेता है, सोचता, समझता है विभिन्न प्रकार के ज्ञानविज्ञान का अध्ययन करता है। इस प्रकार चेतन-अवचेतन दोनों केआधार पर व्यक्ति जीवन व्यतीत करता है  ! अवचेतन भीतर के संस्कारों के आधार पर विनिर्मित है तो चेतन बाहारी वातावरण, बाहारी ज्ञान पर आधरित है यदि भीतर के व्यक्ति के संस्कार गंदे हो व बाहर की संगति भी खराब मिल जाए तो जीवन नरक बन जाता है।भीतर के संस्कार तो प्रारब्ध अथवा भाग्य से आए है जिनको काटना काफी कठिन हो जाता है व मनुष्य के सीधे नियन्त्रण में भी नहीं है परंतु बाहरी वातावरण को व्यक्ति काफी हद तक नियन्त्रित करसकता है स्वयं को अच्छी पुस्तकों अच्छे लोगो के सम्पर्क में रखनेका अधिकाधिक प्रयास करें। गलत विचारो, विषयों का चिन्तन बिल्कुल न करने का प्रयास करें। मन में कुछ न कुछ तो चलता रहेगा जितना हम अच्छा चिन्तन बनाएंगे उतना ही अच्छा चलेगा , इससे अवचेतन मन भी धीरे-2 शुद्ध होता रहेगा।मनोमय कोष एक और प्राणमय कोष का नियन्त्रक है। यदि मनोमयकोष अच्छा नहीं है तो प्राणमयकोष भी अच्छा नहीं होगा। यदि प्राणमय कोष अच्छा नहीं है तो अन्नमयकोष अच्छा नहीं होगा अर्थात व्यक्ति रोगी होगा। प्राणमय कोष को सही करने के कई बार बहुत से प्रयास बेकार चले जाते हैं क्योंकि रोग की जड़ मनोमयकोष में स्थित है। यही कारण है कि बहुत से लोग खाने पीने का ध्यान बहुत रखते हैं ढेर सारे आसन प्राणायाम भी करते है इसके उपंरात भी रोगी बने रहते हैं मनोमय कोष को समझ पाना बहुत जटिलकार्य है ! बहुत से रैकी मास्टर तेजोवलय, अनुभवी प्राणमयकोष का ज्ञान कर पाते है पंरतु मनोमयकोष की जानकारी ले पाना इनकी सामर्थ्य के बाहर की बात होती है। मनोमयकोष को जाग्रत व विकसित कर व्यक्ति वैज्ञानिक, मनीषी, नेता,लेखक दार्शानिक बन सकता है लौकिक जीवन की सभी सफलताएँ मनोमयकोष के ऊपर निर्भर करती हैं!  भारतीय ऋषि मुनियों ने मनोमयकोष के तीन भाग किए है मन, बुद्धि, चित्त ! मनोमयकोष का यह अधिक विस्तृत विवेचन है।
बुद्धि - बुद्धि निर्णय लेने की क्षमता को कहते हैं!
मन- जो विचार व्यक्ति के भीतर चलते रहते हैं, जो वर्तमान काल की मनुष्य की प्रवृति व इच्छाएँ है वो मन के अंर्तगत आती हैं!
चित्त- चित्त में पुराने जन्मों के संस्कारो का संचय रहता है। व्यक्ति का अचानक हृदय परिर्वतन चित्त के आधार पर होता है।
लाहिड़ी महाशय 32 वर्ष तक सामान्य गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर रहे थे।जब उनका स्थानान्तरण रानीखेत हुआ तो अचानक ही वे सामान्य गृहस्थ से महायोगी बन गए, क्योंकि पुर्व जन्म के संस्कार चित्त में योगियों वाले भरे हुए थे। कई बार व्यक्ति का मन प्रबल होता है। जैसे बुद्धि यह निर्णय दे कि ज्वर में मिठाई नहीं खानी है पंरतु मन प्रबल इच्छा करता है व व्यक्ति बिना मीठे खाए नहीं रह पाता क्योंकि मन में त्याग की प्रवृति की कमी है व भोग की प्रबलता है। मनोमयकोष के कमजोर, विकृत होने पर मानव अपना लोकिक जीवन दुख, निराशा, असफलता, रोग, शोक में व्यतीत करता है। अत: मनोमयकोष को निष्काम कर्म, योग, श्रेष्ठ, चिन्तन, मनन आत्मविशेलषण, स्वाध्याय, शुद्ध अन्न, उच्च व दिव्य वातावरण के माध्यम से सशक्त, जाग्रत बनाए रखना बहुत आवश्यक है।विज्ञानमय कोष :- भारतवर्ष में छठी इन्द्रिय अथवा दशम द्वार के बारे में भाँति-2 की ऋद्धि-सिद्धियों के बारे में बहुत सुना जाता है ! ये सब विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आते है। कुण्डलिनी शक्ति का जागरण भी विज्ञानमय कोष के जागरण का ही खेल है ! लौकिक मनुष्य का विज्ञानमयकोष अल्प विकसित होता है क्योंकि इसको विकसित करना दुष्कर कार्य है लौकिक सफलताएँ अर्जित करना इसकी तुलना में आसान होता है क्योकि विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के लिएअधिक संयम, अधिक पुरूषार्थ, तप शक्ति, दिव्य गुणों की आावश्यकता होती है। विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने वाले व्यक्ति को साधक, तपस्वी, देवमानव, सिद्ध पुरूष, योगी, ऋषि आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता है
विज्ञानमय कोष के साधक में प्रज्ञा अर्थात पराज्ञान उपलब्ध होना प्रारम्भ हो जाता है ! वह अपना जीवन दैवी प्रेरणा के आधार पर जीता है। न तो वह अपनी चित्त वृित्तयों का दास होता है न वह बाहरी वातावरण से प्रभावित हो पाता है अपितु अपनी अन्तरात्मा के द्वारा उपलब्ध विशेष ज्ञान द्वारा वह नियन्त्रित, संचालित होता है। सामान्य मानव जहाँ चित्तवृित्तयों का गुलाम होकर रोग, शोक, भोग में लिप्त रहता है वहीं विज्ञानमय कोष का धनी व्यक्ति विभिन्न परालौकिक शक्तियों का स्वामी होता है व दूसरे व्यक्तियों को भी अनुदान वरदान देने की सामर्थ्य रखता है। विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के अधिकारी कम व्यक्ति होते हैं! इसको जाग्रत करने के लिए पहले व्यक्ति किसी बाहरी स्रोत जैसे सदगुरू से प्रेरणा लेकर मनोमय कोष को शुद्ध करने का प्रयास करता है ! चित्त की वृत्तियों की गुलामी छोड़कर अन्तरात्मा की आवाज को सुनने का प्रयास करता है।
मानव के भीतर विभिन्न प्रकार के शक्ति के स्रोत, ज्ञान के स्रोत भरे पड़े हैं उन सभी का अनावरण कर ज्ञानवान, शक्तिवान बनना ही विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत आता है। पुस्तकों द्वारा उपलब्ध ज्ञान व्यक्ति को भटका सकता है परंतु अन्तरात्मा द्वारा उपलब्ध यह ज्ञान बहुत ही पवित्र होता है व साधक को बहुत सन्तुष्ठि, तृप्ति प्रदान करता है। इस कोष के जागरण से विशेषज्ञान, सात लोकों , घटनाचक्रों व समस्त ऋद्धियों-सिद्धियों का विज्ञान प्रकट हो जाता है इसी कारण इस कोष का नाम विज्ञानमयकोष रखा गया है। लौकिक ज्ञान विज्ञान का अर्जन मनोमय कोष के अनावरण से सम्भव है जबकि परालौकिक ज्ञान विज्ञान विज्ञानमयकोष द्वारा सम्भव है।
आनंदमय कोष :- यह कोष परमब्रह्म परमात्मा के सबसे समीप है। परमब्रह्म परमात्मा की तीन विशषताँए है सत् ,चित्त व आंनद। सत् अर्थात सदा अस्तित्व में रहने वाला, चित्त अर्थात चैतन्य अर्थात विभिन्नप्रकार की शक्तियों का मूल तथा आनंद। अपनी इसी तीसरी विशेषता आनन्दमय रहने की प्रवृति के कारण ही वह निर्गुण निराकार मायाप्रकृति के साथ सयुंक्त होकर इस सृष्टि की रचना करता है। एकोहंबहुस्यामि के संकल्प में बंधकर इस विचित्र संसार के रूप में स्वंयको प्रकट करता है। अपनी इसी प्रतृीति से वशीभूत हो योगी मोक्षप्राप्ति का लक्ष्य लेकर ब्रह्मनंद में  निमग्न होकर पुन: उसी तत्वमें विलीन हो जाता है। कैसी अद्भुत लीला है उस परमप्रभु की जो कि बुद्धि की समझ से पूर्णत: बाहर है। निम्न दृष्टांत से हमको समझने में कुछ सहायता अवश्य मिलती है। एक व्यक्ति खाली बैठा बोर हो रहा था। उसने सोचा चलो खेलते है। उसने मुहल्ले के अन्य व्यक्तियों को एकत्र किया व सभी कबड्डी  खेलने लगे। उसमें चोट भी लगी,कपड़े भी फटे पर आनंद बहुत आया। दो घण्टे खेलने के पश्चात् वे पुन: जहाँ-2 से आए थे वहीं चले गए।
कुछ इसी प्रकार का रहस्य नजर आता है सृष्टि की रचना में। प्रत्येक प्राणी वहीं से प्रकट होता है और चाहे अनचाहे अंत में उसी में विलीन हो जाता है। सैदव उत्साहित, उल्लासित, प्रसन्न रहना ही आत्मा का मूल स्वभाव है। उसकी लीला उसी को समर्पित कर सदैव आनंदमय रहना चाहिए। सृष्टि के अधिकाँश रहस्य व विज्ञान मानव मन की समझ से बाहर है।
योगी अथवा साधक अन्नमय कोष को शुद्ध करके प्राणमय कोष को सन्तुलित करते हुए मनोमय कोष को नियन्त्रित करके विज्ञानमय कोष को जाग्रत कर लेता है तब वह आनंदमय कोष में स्वत: ही पहुँच जाता है इस स्थिति को ब्रह्मनंद की संज्ञा देते है! इसे अन्य सभी लौकिक आनंदों की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक बताया गया है। जब योगी को सृष्टि के सारे रहस्य स्पष्ट हो जाते है, वह अनेक प्रकार की शक्तियों का स्वामी हो जाता है तो उसके जीवन में किसी प्रकारका कोई दुख, कष्ट, अभाव नहीं रह जाता। इस स्थिति को ही शास्त्रों में मोक्ष की संज्ञा दी गयी है व इस स्थिति को प्राप्त करना ही मानव जीवन का लक्ष्य बताया गया है। वैज्ञानिकों ने आनंदमय कोष के संबंध में चूहों पर एक प्रयोग किया था। उनका मानना है कि प्राणियों के मस्तिष्क में एक pleasure centre होता है यदि इसको उत्तेजित किया जा सके तो सदा आनंदमय स्थिति में बने रहा जा सकता है !इलैक्ट्राड लगाकर इस केंद्र को उत्तेजित किया गया तो वो बहुत ही आनंदमय हो गए। इस स्थिति में रहने पर वो कुछ भी खाना पीना नहीं चाहते केवल इसी स्थिति में बने रहना चाहते है। संभव है योगी मस्तिष्क के इस केंद्र को उत्तेजित कर सदैव आनंदमय स्थिति में रहते हों।उपरोक्त विवरण मात्र कोषों के दार्शानिक पक्ष पर प्रकाश डालताहै। इन कोषों को सशक्त, जाग्रत, अनावरत करने का विशेष साधन विज्ञान भी है जिसका विवरण देना यहां संभव नहीं है।

।  ॐ शांतिः शांतिः शांतिः  ।

।  ओम् इति एकाक्षरम् बह्म  ।

।  अहम् ब्रह्मास्मि  ।