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Thursday, August 23, 2018

शिव महापुराण - एक अध्ययन

शिव महापुराण

शिव का अर्थ है कल्याण। शिव के महात्मय से ओत-प्रोत से यह पुराण शिव महापुराण (shiv puran) के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान शिव पापों का नाश करने वाले देव हैं तथा बड़े सरल स्वभाव के हैं। इनका एक नाम भोला भी है। अपने नाम के अनुसार ही बड़े भोले-भाले एवं शीघ्र ही प्रसन्न होकर भक्तों को मनवाँछित फल देने वाले हैं। 18 पुराणों में कहीं शिव पुराण (shiv puran) तो कहीं वायु पुराण का वर्णन आता है।

‘शिव पुराण‘ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु ‘शिव पुराण’ (shiv puran) में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

भगवान शिव सदैव लोकोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति को सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती । शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं।

जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से ‘जीवन’ और ‘मृत्यु’ का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।

‘रामचरितमानस’  में तुलसीदास ने जिन्हें ‘अशिव वेषधारी’ और ‘नाना वाहन नाना भेष’ वाले गणों का अधिपति कहा है, वे शिव जन-सुलभ तथा आडम्बर विहीन वेष को ही धारण करने वाले हैं। वे ‘नीलकंठ’ कहलाते हैं। क्योंकि समुद्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए मरे जा रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। तभी से शिव नीलकंठ कहलाए। क्योंकि विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था।

ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही इस पुराण की रचना की गई है। यह पुराण पूर्णत: भक्ति ग्रन्थ है | इस पुराण में कलियुग के पापकर्म से ग्रसित व्यक्ति को ‘मुक्ति’ के लिए शिव-भक्ति का मार्ग सुझाया गया है।

मनुष्य को निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म शिव को अर्पित कर देने चाहिए। वेदों और उपनिषदों में ‘प्रणव – ॐ’ के जप को मुक्ति का आधार बताया गया है। प्रणव के अतिरिक्त ‘गायत्री मन्त्र’  के जप को भी शान्ति और मोक्षकारक कहा गया है।

शिव पुराण कथा सार :

भगवान नारायण जब जल में शयन कर रहे थे तभी उनकी नाभि से एक सुन्दर एवं विशाल कमल प्रकट हुआ। उस कमल में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुये। माया के वश में होने के कारण ब्रह्मा जी अपनी उत्पत्ति के कारण को नहीं जान सके। चारों ओर उन्हें जल ही जल दिखायी पड़ा तब आकाशवाणी हुयी, ‘‘तपस्या करो’’। बारह वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात् भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में उन्हें दर्शन दिये और कहा मैंनें तुम्हें सत्व गुण से निर्माण किया है लेकिन मायावश ब्रह्मा जी विष्णुजी के स्वरूप को न जानकर उनसे युद्ध करने लगे। तब दोनों के विवाद को शान्त करने के लिये एक अद्भुत ज्योर्तिलिंग का अर्विभाव हुआ। दोनों बड़े आश्चर्य के साथ इस ज्योर्तिलिंग को देखते रहे और इसका स्वरूप जानने के लिये ब्रह्मा हंस स्वरूप बनाकर ऊपर की ओर और विष्णु वाराह स्वरूप धारण कर नीचे की ओर गये। लेकिन दोनों ही ज्योर्तिलिंग के आदि-अन्त का पता नहीं कर सके।

इस प्रकार 100 वर्ष बीत गये। इसके पश्चात् ज्योर्तिलिंग से उन्हें ओंकार शब्द का नाद सुनायी पड़ा और पँचमुखी एक मुर्ति दिखायी पड़ी। ये ही शिव थे। ब्रह्मा और विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया, तब शिव ने कहा, ‘‘कि तुम दोनों मेरे ही अंश से उत्पन्न हुये हो।’’ और ब्रह्मा को सृष्टि की रचना एवं विष्णु को सृष्टि का पालन करने की जिम्मेदारी प्रदान की। शिव पुराण में 24000 श्लोक हैं। इसमें तारकासुर वध, मदन दाह, पार्वती की तपस्या, शिव-पावती विवाह, कार्तिकेय का जन्म, त्रिपुर का वध, केतकी के पुष्प शिव पुजा में निषेद्य, रावण की शिव-भक्ति (Shiv Bhakti) आदि प्रसंग वर्णित हैं।

शिव पुराण में 12 संहितायें हैं –

1. विघ्नेश्वर संहिता 2. रुद्र संहिता 3. वैनायक संहिता 4. भौम संहिता 5. मात्र संहिता 6. रूद्रएकादश संहिता7. कैलाश संहिता 8. शत् रूद्र संहिता 9. कोटि रूद्र संहिता 10. सहस्र कोटि रूद्र संहिता 11. वायवीय संहिता 12. धर्म संहिता

विघ्नेश्वर तथा रौद्रं वैनायक मनुत्तमम्।
भौमं मात्र पुराणं च रूद्रैकादशं तथा।।

कैलाशं शत्रूद्रं च कोटि रूद्राख्यमेव च।
सहस्रकोटि रूद्राख्यंवायुवीय ततःपरम्।।

धर्मसंज्ञं पुराणं चेत्यैवं द्वादशः संहिता।
तदैव लक्षणमुदिष्टं शैवं शाखा विभेदतः।।

इन संहिताओं के श्रवण करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। मनुष्य को चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य से सम्पन्न हो बडे आदर से इनका श्रवण करे। बारह  संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा (Shiv Mahapuran) के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है।

विघ्नेश्वर संहिता :

इस संहिता में शिवरात्रि व्रत (Shivratri Vrat), पंचकृत्य, ओंकार का महत्त्व, शिवलिंग की पूजा (Shiv Ling Puja) और दान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। शिव की भस्म और रुद्राक्ष का महत्त्व भी बताया गया है। रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही अधिक फलदायक होता है। खंडित रुद्राक्ष, कीड़ों द्वारा खाया हुआ रुद्राक्ष या गोलाई रहित रुद्राक्ष कभी धारण नहीं करना चाहिए। सर्वोत्तम रुद्राक्ष वह है जिसमें स्वयं ही छेद होता है।

सभी वर्ण के मनुष्यों को प्रात:काल की भोर वेला में उठकर सूर्य की ओर मुख करके देवताओं अर्थात् शिव का ध्यान करना चाहिए। अर्जित धन के तीन भाग करके एक भाग धन वृद्धि में, एक भाग उपभोग में और एक भाग धर्म-कर्म में व्यय करना चाहिए। इसके अलावा क्रोध कभी नहीं करना चाहिए और न ही क्रोध उत्पन्न करने वाले वचन बोलने चाहिए।

रुद्र संहिता :

रुद्र संहिता में शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है। इसमें नारद मोह की कथा, सती का दक्ष-यज्ञ में देह त्याग, पार्वती विवाह, मदन दहन, कार्तिकेय और गणेश पुत्रों का जन्म, पृथ्वी परिक्रमा की कथा, शंखचूड़ से युद्ध और उसके संहार आदि की कथा का विस्तार से उल्लेख है। शिव पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस (पंचामृत) से स्नान कराके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका तथा कमल के पुष्प चढ़ाएं। फिर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल अर्पित करें। इससे शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं।

इसी संहिता में ‘सृष्टि खण्ड’ के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति ‘माया’ का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही ‘ब्रह्मा’ और ‘विष्णु’ की उत्पत्ति बताई गई है।

शतरुद्र संहिता :

इस संहिता में शिव के अन्य चरित्रों-हनुमान, श्वेत मुख और ऋषभदेव का वर्णन है। उन्हें शिव का अवतार कहा गया है। शिव की आठ मूर्तियां भी बताई गई हैं। इन आठ मूर्तियों से भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं। इस संहिता में शिव के लोकप्रसिद्ध ‘अर्द्धनारीश्वर‘ रूप धारण करने की कथा बताई गई है। यह स्वरूप सृष्टि-विकास में ‘मैथुनी क्रिया’ के योगदान के लिए धरा गया था। ‘शिवपुराण’ (Shiv Mahapuran) की ‘शतरुद्र संहिता’ के द्वितीय अध्याय में भगवान शिव को अष्टमूर्ति कहकर उनके आठ रूपों शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव का उल्लेख है। शिव की इन अष्ट मूर्तियों द्वारा पांच महाभूत तत्व, ईशान (सूर्य), महादेव (चंद्र), क्षेत्रज्ञ (जीव) अधिष्ठित हैं। चराचर विश्व को धारण करना (भव), जगत के बाहर भीतर वर्तमान रह स्पन्दित होना (उग्र), आकाशात्मक रूप (भीम), समस्त क्षेत्रों के जीवों का पापनाशक (पशुपति), जगत का प्रकाशक सूर्य (ईशान), धुलोक में भ्रमण कर सबको आह्लाद देना (महादेव) रूप है।

कोटिरुद्र संहिता :

कोटिरुद्र संहिता में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। ये ज्योतिर्लिंगों क्रमश: सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओंकार में अम्लेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ , गोमती तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वर, दारूक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर हैं। इसी संहिता में विष्णु द्वारा शिव के सहस्त्र नामों का वर्णन भी है। साथ ही शिवरात्रि व्रत के माहात्म्य के संदर्भ में व्याघ्र और सत्यवादी मृग परिवार की कथा भी है। भगवान ‘केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के दर्शन के बाद बद्रीनाथ में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है।

इसी आशय की महिमा को ‘शिवपुराण’ के ‘कोटिरुद्र संहिता’ में भी व्यक्त किया गया है-

तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते।
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।।

दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च।
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।।

इस संहिता में भगवान शिव के लिए तप, दान और ज्ञान का महत्त्व समझाया गया है। यदि निष्काम कर्म से तप किया जाए तो उसकी महिमा स्वयं ही प्रकट हो जाती है। अज्ञान के नाश से ही सिद्धि प्राप्त होती है। ‘शिवपुराण’ का अध्ययन करने से अज्ञान नष्ट हो जाता है। इस संहिता में विभिन्न प्रकार के पापों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कौन-से पाप करने से कौन-सा नरक प्राप्त होता है। पाप हो जाने पर प्रायश्चित्त के उपाय आदि भी इसमें बताए गए हैं।

उमा संहिता :

‘उमा संहिता‘ में देवी पार्वती के अद्भुत चरित्र तथा उनसे संबंधित लीलाओं का उल्लेख किया गया है। चूंकि पार्वती भगवान शिव के आधे भाग से प्रकट हुई हैं और भगवान शिव का आंशिक स्वरूप हैं, इसीलिए इस संहिता में उमा महिमा का वर्णन कर अप्रत्यक्ष रूप से भगवान शिव के ही अर्द्धनारीश्वर स्वरूप का माहात्म्य प्रस्तुत किया गया है।

कैलास संहिता :

कैलास संहिता में ओंकार के महत्त्व का वर्णन है। इसके अलावा योग का विस्तार से उल्लेख है। इसमें विधिपूर्वक शिवोपासना, नान्दी श्राद्ध और ब्रह्मयज्ञादि की विवेचना भी की गई है। गायत्री जप का महत्त्व तथा वेदों के बाईस महावाक्यों के अर्थ भी समझाए गए हैं।

वायु संहिता :

इस संहिता के पूर्व और उत्तर भाग में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्त्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं। शिव के ‘निर्गुण’ और ‘सगुण’ रूप का विवेचन करते हुए कहा गया है कि शिव एक ही हैं, जो समस्त प्राणियों पर दया करते हैं। इस कार्य के लिए ही वे सगुण रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार ‘अग्नि तत्त्व’ और ‘जल तत्त्व’ को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूप में प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति के सम्मुख आते हैं शिव की महिमा का गान ही इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय है।

शिवपुराण सुनने का फल :

शिवपुराण में वर्णन आया है कि जो भी श्रद्धा से शिव पुराण कथा का श्रवण करता है वह जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है और भगवान शंकर के परम धाम को प्राप्त करता है। अन्य देवताओं की अपेक्षा भगवान शंकर जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़ी सी पूजा का बहुत-बड़ा फल प्रदान करते हैं। एक बार भष्मासुर ने भगवान शंकर की तपस्या कर इच्छित वर माँग लिया कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखुँ वह भष्म हो जाये। भगवान शंकर इतने भोले-भाले कि बिना सोचे-समझे उन्होंनें भष्मासुर को तथास्तु प्रदान किया।

भष्मासुर ने सोचा कि पहले शंकर जी को ही भष्म करके देखता हूँ। भष्मासुर भगवान शंकर के पीछे दौड़ पड़े। भगवान शंकर दौड़ते हुये भगवान विष्णु के पास जा पहुँचे। सो भगवान विष्णु ने मोहिनी स्वरूप धारण कर भष्मासुर का हाथ उसके अपने सिर पर रखवा कर भगवान शंकर की रक्षा की।

इसलिये भगवान शंकर की थोड़ी भी पूजा कर दी जाये तो वह प्रसन्न हो बहुत ज्यादा फल देते हैं। जो शिव पुराण की कथा श्रवण करते हैं उन्हें कपिला गायदान के बराबर फल मिलता है। पुत्रहीन को पुत्र, मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त होता है तथा उस जीव के कोटि जन्म पाप नष्ट हो जाते हैं और शिव धाम की प्राप्ति होती है। इसलिये शिव पुराण कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिये।

जो निरन्तर अनुसंधानपूर्वक इस शिवपुराण को बांचता है अथवा नित्य प्रेमपूर्वक इसका पाठमात्र करता है, वह पुण्यात्मा है –
इसमे संशय नहीं है। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष अन्तकाल मे भक्तिपूर्वक इस पुराण को सुनता है, उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुये भगवान महेश्वर उसे अपना पद (धाम) प्रदान करते हैं। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक इस शिवपुराण का पूजन करता है, वह इस संसार मे सम्पूर्ण भोगों को भोगकर अन्त मे भगवान शिव के पद को प्राप्त कर लेता है। जो प्रतिदिन आलस्यरहित हो रेशमी वस्त्र आदि के वेष्टन से इस शिवपुराण का सत्कार करता है, वह सदा सुखी होता है। यह शिवपुराण निर्मल तथा भगवान शिव का सर्वस्व है; जो इहलोक और परलोक मे भी सुख चाहता हो, उसे आदर के साथ प्रयत्नपूर्वक इसका सेवन करना चाहिये। यह निर्मल एवं उत्तम शिवपुराण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। अत: सदा प्रेमपूर्वक इसका श्रवण एवं विशेष पाठ करना चाहिये।

शिवपुराण पूजा विधि :

पूजा के दिन प्रात: स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर पवित्र हो जायें तत्पश्चात पूजास्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी को पवित्र जल अर्पित करें। शिवलिंग पर मिट्टी के बर्तन में पवित्र जल भरकर ऊपर से बिल्वपत्र, आक व धतूरे के पुष्प, चंदन, चावल आदि के साथ चढायें। यदि नजदीक कोई शिवालय न हो तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा भी की जा सकती है। महाशिवरात्रि पर व्रत के साथ रात्रि जागरण करना चाहिये व शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिये। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बिल्वपत्र का हवन करके व्रत को समाप्त करना चाहिये।

शिवपुराण पूजा के दौरान इन बातों का भी रखें ध्यान :

जो भी शिवपुराण कथा करता है उसे कथा प्रारंभ करने से एक दिन पहले ही व्रत रखने के लिये बाल, नाखून इत्यादि कटवा लेने चाहिये। क्योंकि कथा समाप्ति तक किसी भी प्रकार का क्षौर कर्म नहीं किया जाता। कथा सुनने वाले भी ध्यान रखें कि देर से पचने वाला अर्थात दाल, तला हुआ भोजन, मसूर, बासी अन्न आदि खाकर भी शिवपुराण को नहीं सुनना चाहिये।

कथा श्रोताओं को सबसे पहले कथा वाचक से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। दीक्षा लेने के बाद ब्रह्मचर्य का पालन करना, जमीन पर सोना, पत्तल में खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त होने के बाद ही भोजन करना चाहिये। शिवपुराण कथा का व्रत जो भी लेता है उसे दिन में एक ही बार जौ, तिल या चावल का भोजन ग्रहण करना चाहिये, जिसने सिर्फ कथा सुनने के लिये व्रत किया हो वह प्याज, लहसुन, हींग, गाजर, मादक वस्तुओं का सेवन न करे।

कथा करने वाला काम क्रोध से बचे, ब्राह्मण व साधु-संतो की निंदा भी उसे नहीं करनी चाहिये। गरीब, रोगी, पापी भाग्यहीनएवं नि:संतानों को शिवपुराण की कथा जरुर सुननी चाहिये। कथा समाप्ति को एक उत्सव के रुप में मनाना चाहिये भगवान शिव व शिवपुराण की पूजा करनी चाहिये, कथावाचक की पूजा कर उन्हें दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। कथा सुनने आये ब्राह्मणों का भी आदर सत्कार कर उन्हें भी दान-दक्षिणा दी जानी चाहिये।

शिव पुराण करवाने का मुहुर्त:-

शिव पुराण कथा करवाने के लिये सर्वप्रथम विद्वान ब्राह्मणों से उत्तम मुहुर्त निकलवाना चाहिये। शिव पुराण के लिये श्रावण-भाद्रपद, आश्विन, अगहन, माघ, फाल्गुन, बैशाख और ज्येष्ठ मास विशेष शुभ हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार जिस दिन शिव पुराण कथा प्रारम्भ कर दें, वही शुभ मुहुर्त है।

शिव पुराण का आयोजन कहाँ करें?:-

शिव पुराण करवाने के लिये स्थान अत्यधिक पवित्र होना चाहिये। जन्म भूमि में शिव पुराण करवाने का विशेष महत्व बताया गया है – जननी जन्मभूमिश्चः स्वर्गादपि गरियशी – इसके अतिरिक्त हम तीर्थों में भी शिव पुराण का आयोजन कर विशेष फल प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी जहाँ मन को सन्तोष पहुँचे, उसी स्थान पर कथा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

शिव पुराण करने के नियम:-
शिव पुराण का वक्ता विद्वान ब्राह्मण होना चाहिये। उसे शास्त्रों एवं वेदों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिये। शिव पुराण में सभी ब्राह्मण सदाचारी हों और सुन्दर आचरण वाले हों। वो सन्ध्या बन्धन एवं प्रतिदिन गायत्री जाप करते हों। ब्राह्मण एवं यजमान दोनों ही सात दिनों तक उपवास रखें। केवल एक समय ही भोजन करें। भोजन शुद्ध शाकाहारी होना चाहिये। स्वास्थ्य ठीक न हो तो भोजन कर सकते हैं।

शिव पुराण में कितना धन लगता है?:- Money to Spent on conducting shiv Puran
इस भौतिक युग में बिना धन के कुछ भी सम्भव नहीं एवं बिना धन के धर्म भी नहीं होता। पुराणों में वर्णन है कि पुत्री के विवाह में जितना धन लगे उतना ही धन शिव पुराण में लगाना चाहिये और पुत्री के विवाह में जितनी खुशी हो उतनी ही खुशी मन से शिव पुराण को करना चाहिये।

‘‘विवाहे यादष्शं वित्तं तादष्श्यं परिकल्पयेत’’

#साभार:Bhaktisanskar.Com

नमो निष्कलरूपाय
नमो निष्कलतेजसे।
नम: सकलनाथाय
नमस्ते सकलात्मने।।
नम: प्रणववाच्याय
नम: प्रणवलिङ्गिने।
नम: सृष्टयादिकर्त्रे च
नम: पञ्चमुखाय ते।।

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#संकलित लेख

Friday, April 20, 2018

Six Darshan and BrahmSutra

Brahmasutra & six Indian Philosophy
There are six systems of Indian philosophy which uphold the authorities of Vedas.These are Nyaya, Vaisheshika, Sankhya, Yoga,Purva Mimansa & Utter Mimansa. ThevJain & Buddhist schools of thought do not recognizes the supremacy of Vedas.
Out of these 6 darshans one is Brahma Sutras known as Badarayan Sutra, Utter Mimansa or Bhikshu Sutras.It is the last one among shad darshans which tell a lot of Upanishadic philosophy which reject the conclusions of all others like Buddha & Jain philosophy. In this connection we have to remember that each of the systems of philosophy has its distinct world view, trying to find out answers to the fundamental questions of philosophy such as where this world has been emanated, how it has come to present shape or structure and how it is functioning. All these basic questions are being discussed in each in a separate manner to find out an answer or answers which may or may not be liked by all.