Sunday, August 26, 2018

योगिनी द्वारा सफलता प्राप्ति

#जय #मांपीताम्बरा #बगलामुखी

माँ पीताम्बरा बगलामुखी के आशीर्वाद सें, अपने जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करे,
अपने सपनों को कैसे साकार कर सकते हैं...
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आप जानते हैं कि.... 10 महाविद्या में मां पीताम्बरा बगलामुखी का एक विशेष स्थान है. माँ पीताम्बरा बगलामुखी, अपने साधकों, उपासकों और भक्तों को कार्यसिध्दि तथा शतृनाश करने के लिए प्रसिद्ध है.
माँ पीताम्बरा बगलामुखी के आसपास एक के बाद एक, 4 आवरण होते हैं. दैनिक पूजा में जो आवरण पूजा होती है वह है...
1) गणपति
2) भैरव
3) योगिनी  और
4) क्षेत्रपाल

यहां, माँ पीताम्बरा बगलामुखी, अपने उपासकों के कार्य, #योगिनी  द्वारा कैसे सिद्ध करती है उसके विशयमें बात करता हूं...

योगिनियां जानती हैं कि आप अपनी उच्चतम उम्मीदों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं क्योंकि देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की योगिनियां और सार्वभौमिक ऊर्जा हमेशा दृश्यों के पीछे काम करती हैं जो आपको आपकी इच्छाओं और आवश्यकताओं, लक्ष्यों को प्रकट करने में मदद करती हैं।

देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की योगिनियां निरंतर आपको शक्तिशाली संकेत दे रहीं हैं कि आप अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलना चाहते हैं और नई दिशाएं ले सकते हैं या नई परियोजनाओं और उद्यमों को शुरू कर सकते हैं।

जिन्हें आप लंबे समय से करना चाहते हैं। दिव्य योगिनियां आपको सहायता देने तथा आपको डर और आशंकाओं को मुक्त करने, आपके जुनून और उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं ।

आपके आसपास उपस्थित ये शक्तियां चाहतीं है कि आप अपने सकारात्मक कौशल पर बने रहें और अपने प्राकृतिक कौशल, प्रतिभा और क्षमताओं का उपयोग अपने और दूसरों के लाभ के लिए करें।

अपनी ऊर्जा को और अधिक बढ़ाने और अपनी योगिनियों को अपने प्रति आकर्षित करने के लिए। आप सकारात्मक प्रतिज्ञान और विज़ुअलाइज़ेशन का उपयोग करें।
जितना अधिक आप सकारात्मक पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तेज़ी से आपके लक्ष्य देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की इन्हीं योगिनियों द्वारा आपकी वास्तविकता में प्रकट होना आरंभ हो जाएंगे । आप अपने काम में सफलता हासिल कर सकते हैं.

।। जय मां पीताम्बरा बगलामुखी । ।

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#महेन्द्रभाइ  #रावल
#अध्यक्ष
पीताम्बरा पीठ शोध संस्थान
कर्णावती
#गुजरात

Thursday, August 23, 2018

शिव महापुराण - एक अध्ययन

शिव महापुराण

शिव का अर्थ है कल्याण। शिव के महात्मय से ओत-प्रोत से यह पुराण शिव महापुराण (shiv puran) के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान शिव पापों का नाश करने वाले देव हैं तथा बड़े सरल स्वभाव के हैं। इनका एक नाम भोला भी है। अपने नाम के अनुसार ही बड़े भोले-भाले एवं शीघ्र ही प्रसन्न होकर भक्तों को मनवाँछित फल देने वाले हैं। 18 पुराणों में कहीं शिव पुराण (shiv puran) तो कहीं वायु पुराण का वर्णन आता है।

‘शिव पुराण‘ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु ‘शिव पुराण’ (shiv puran) में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

भगवान शिव सदैव लोकोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति को सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती । शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं।

जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से ‘जीवन’ और ‘मृत्यु’ का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।

‘रामचरितमानस’  में तुलसीदास ने जिन्हें ‘अशिव वेषधारी’ और ‘नाना वाहन नाना भेष’ वाले गणों का अधिपति कहा है, वे शिव जन-सुलभ तथा आडम्बर विहीन वेष को ही धारण करने वाले हैं। वे ‘नीलकंठ’ कहलाते हैं। क्योंकि समुद्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए मरे जा रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। तभी से शिव नीलकंठ कहलाए। क्योंकि विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था।

ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही इस पुराण की रचना की गई है। यह पुराण पूर्णत: भक्ति ग्रन्थ है | इस पुराण में कलियुग के पापकर्म से ग्रसित व्यक्ति को ‘मुक्ति’ के लिए शिव-भक्ति का मार्ग सुझाया गया है।

मनुष्य को निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म शिव को अर्पित कर देने चाहिए। वेदों और उपनिषदों में ‘प्रणव – ॐ’ के जप को मुक्ति का आधार बताया गया है। प्रणव के अतिरिक्त ‘गायत्री मन्त्र’  के जप को भी शान्ति और मोक्षकारक कहा गया है।

शिव पुराण कथा सार :

भगवान नारायण जब जल में शयन कर रहे थे तभी उनकी नाभि से एक सुन्दर एवं विशाल कमल प्रकट हुआ। उस कमल में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुये। माया के वश में होने के कारण ब्रह्मा जी अपनी उत्पत्ति के कारण को नहीं जान सके। चारों ओर उन्हें जल ही जल दिखायी पड़ा तब आकाशवाणी हुयी, ‘‘तपस्या करो’’। बारह वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात् भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में उन्हें दर्शन दिये और कहा मैंनें तुम्हें सत्व गुण से निर्माण किया है लेकिन मायावश ब्रह्मा जी विष्णुजी के स्वरूप को न जानकर उनसे युद्ध करने लगे। तब दोनों के विवाद को शान्त करने के लिये एक अद्भुत ज्योर्तिलिंग का अर्विभाव हुआ। दोनों बड़े आश्चर्य के साथ इस ज्योर्तिलिंग को देखते रहे और इसका स्वरूप जानने के लिये ब्रह्मा हंस स्वरूप बनाकर ऊपर की ओर और विष्णु वाराह स्वरूप धारण कर नीचे की ओर गये। लेकिन दोनों ही ज्योर्तिलिंग के आदि-अन्त का पता नहीं कर सके।

इस प्रकार 100 वर्ष बीत गये। इसके पश्चात् ज्योर्तिलिंग से उन्हें ओंकार शब्द का नाद सुनायी पड़ा और पँचमुखी एक मुर्ति दिखायी पड़ी। ये ही शिव थे। ब्रह्मा और विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया, तब शिव ने कहा, ‘‘कि तुम दोनों मेरे ही अंश से उत्पन्न हुये हो।’’ और ब्रह्मा को सृष्टि की रचना एवं विष्णु को सृष्टि का पालन करने की जिम्मेदारी प्रदान की। शिव पुराण में 24000 श्लोक हैं। इसमें तारकासुर वध, मदन दाह, पार्वती की तपस्या, शिव-पावती विवाह, कार्तिकेय का जन्म, त्रिपुर का वध, केतकी के पुष्प शिव पुजा में निषेद्य, रावण की शिव-भक्ति (Shiv Bhakti) आदि प्रसंग वर्णित हैं।

शिव पुराण में 12 संहितायें हैं –

1. विघ्नेश्वर संहिता 2. रुद्र संहिता 3. वैनायक संहिता 4. भौम संहिता 5. मात्र संहिता 6. रूद्रएकादश संहिता7. कैलाश संहिता 8. शत् रूद्र संहिता 9. कोटि रूद्र संहिता 10. सहस्र कोटि रूद्र संहिता 11. वायवीय संहिता 12. धर्म संहिता

विघ्नेश्वर तथा रौद्रं वैनायक मनुत्तमम्।
भौमं मात्र पुराणं च रूद्रैकादशं तथा।।

कैलाशं शत्रूद्रं च कोटि रूद्राख्यमेव च।
सहस्रकोटि रूद्राख्यंवायुवीय ततःपरम्।।

धर्मसंज्ञं पुराणं चेत्यैवं द्वादशः संहिता।
तदैव लक्षणमुदिष्टं शैवं शाखा विभेदतः।।

इन संहिताओं के श्रवण करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। मनुष्य को चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य से सम्पन्न हो बडे आदर से इनका श्रवण करे। बारह  संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा (Shiv Mahapuran) के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है।

विघ्नेश्वर संहिता :

इस संहिता में शिवरात्रि व्रत (Shivratri Vrat), पंचकृत्य, ओंकार का महत्त्व, शिवलिंग की पूजा (Shiv Ling Puja) और दान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। शिव की भस्म और रुद्राक्ष का महत्त्व भी बताया गया है। रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही अधिक फलदायक होता है। खंडित रुद्राक्ष, कीड़ों द्वारा खाया हुआ रुद्राक्ष या गोलाई रहित रुद्राक्ष कभी धारण नहीं करना चाहिए। सर्वोत्तम रुद्राक्ष वह है जिसमें स्वयं ही छेद होता है।

सभी वर्ण के मनुष्यों को प्रात:काल की भोर वेला में उठकर सूर्य की ओर मुख करके देवताओं अर्थात् शिव का ध्यान करना चाहिए। अर्जित धन के तीन भाग करके एक भाग धन वृद्धि में, एक भाग उपभोग में और एक भाग धर्म-कर्म में व्यय करना चाहिए। इसके अलावा क्रोध कभी नहीं करना चाहिए और न ही क्रोध उत्पन्न करने वाले वचन बोलने चाहिए।

रुद्र संहिता :

रुद्र संहिता में शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है। इसमें नारद मोह की कथा, सती का दक्ष-यज्ञ में देह त्याग, पार्वती विवाह, मदन दहन, कार्तिकेय और गणेश पुत्रों का जन्म, पृथ्वी परिक्रमा की कथा, शंखचूड़ से युद्ध और उसके संहार आदि की कथा का विस्तार से उल्लेख है। शिव पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस (पंचामृत) से स्नान कराके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका तथा कमल के पुष्प चढ़ाएं। फिर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल अर्पित करें। इससे शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं।

इसी संहिता में ‘सृष्टि खण्ड’ के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति ‘माया’ का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही ‘ब्रह्मा’ और ‘विष्णु’ की उत्पत्ति बताई गई है।

शतरुद्र संहिता :

इस संहिता में शिव के अन्य चरित्रों-हनुमान, श्वेत मुख और ऋषभदेव का वर्णन है। उन्हें शिव का अवतार कहा गया है। शिव की आठ मूर्तियां भी बताई गई हैं। इन आठ मूर्तियों से भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं। इस संहिता में शिव के लोकप्रसिद्ध ‘अर्द्धनारीश्वर‘ रूप धारण करने की कथा बताई गई है। यह स्वरूप सृष्टि-विकास में ‘मैथुनी क्रिया’ के योगदान के लिए धरा गया था। ‘शिवपुराण’ (Shiv Mahapuran) की ‘शतरुद्र संहिता’ के द्वितीय अध्याय में भगवान शिव को अष्टमूर्ति कहकर उनके आठ रूपों शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव का उल्लेख है। शिव की इन अष्ट मूर्तियों द्वारा पांच महाभूत तत्व, ईशान (सूर्य), महादेव (चंद्र), क्षेत्रज्ञ (जीव) अधिष्ठित हैं। चराचर विश्व को धारण करना (भव), जगत के बाहर भीतर वर्तमान रह स्पन्दित होना (उग्र), आकाशात्मक रूप (भीम), समस्त क्षेत्रों के जीवों का पापनाशक (पशुपति), जगत का प्रकाशक सूर्य (ईशान), धुलोक में भ्रमण कर सबको आह्लाद देना (महादेव) रूप है।

कोटिरुद्र संहिता :

कोटिरुद्र संहिता में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। ये ज्योतिर्लिंगों क्रमश: सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओंकार में अम्लेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ , गोमती तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वर, दारूक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर हैं। इसी संहिता में विष्णु द्वारा शिव के सहस्त्र नामों का वर्णन भी है। साथ ही शिवरात्रि व्रत के माहात्म्य के संदर्भ में व्याघ्र और सत्यवादी मृग परिवार की कथा भी है। भगवान ‘केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के दर्शन के बाद बद्रीनाथ में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है।

इसी आशय की महिमा को ‘शिवपुराण’ के ‘कोटिरुद्र संहिता’ में भी व्यक्त किया गया है-

तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते।
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।।

दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च।
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।।

इस संहिता में भगवान शिव के लिए तप, दान और ज्ञान का महत्त्व समझाया गया है। यदि निष्काम कर्म से तप किया जाए तो उसकी महिमा स्वयं ही प्रकट हो जाती है। अज्ञान के नाश से ही सिद्धि प्राप्त होती है। ‘शिवपुराण’ का अध्ययन करने से अज्ञान नष्ट हो जाता है। इस संहिता में विभिन्न प्रकार के पापों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कौन-से पाप करने से कौन-सा नरक प्राप्त होता है। पाप हो जाने पर प्रायश्चित्त के उपाय आदि भी इसमें बताए गए हैं।

उमा संहिता :

‘उमा संहिता‘ में देवी पार्वती के अद्भुत चरित्र तथा उनसे संबंधित लीलाओं का उल्लेख किया गया है। चूंकि पार्वती भगवान शिव के आधे भाग से प्रकट हुई हैं और भगवान शिव का आंशिक स्वरूप हैं, इसीलिए इस संहिता में उमा महिमा का वर्णन कर अप्रत्यक्ष रूप से भगवान शिव के ही अर्द्धनारीश्वर स्वरूप का माहात्म्य प्रस्तुत किया गया है।

कैलास संहिता :

कैलास संहिता में ओंकार के महत्त्व का वर्णन है। इसके अलावा योग का विस्तार से उल्लेख है। इसमें विधिपूर्वक शिवोपासना, नान्दी श्राद्ध और ब्रह्मयज्ञादि की विवेचना भी की गई है। गायत्री जप का महत्त्व तथा वेदों के बाईस महावाक्यों के अर्थ भी समझाए गए हैं।

वायु संहिता :

इस संहिता के पूर्व और उत्तर भाग में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्त्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं। शिव के ‘निर्गुण’ और ‘सगुण’ रूप का विवेचन करते हुए कहा गया है कि शिव एक ही हैं, जो समस्त प्राणियों पर दया करते हैं। इस कार्य के लिए ही वे सगुण रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार ‘अग्नि तत्त्व’ और ‘जल तत्त्व’ को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूप में प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति के सम्मुख आते हैं शिव की महिमा का गान ही इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय है।

शिवपुराण सुनने का फल :

शिवपुराण में वर्णन आया है कि जो भी श्रद्धा से शिव पुराण कथा का श्रवण करता है वह जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है और भगवान शंकर के परम धाम को प्राप्त करता है। अन्य देवताओं की अपेक्षा भगवान शंकर जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़ी सी पूजा का बहुत-बड़ा फल प्रदान करते हैं। एक बार भष्मासुर ने भगवान शंकर की तपस्या कर इच्छित वर माँग लिया कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखुँ वह भष्म हो जाये। भगवान शंकर इतने भोले-भाले कि बिना सोचे-समझे उन्होंनें भष्मासुर को तथास्तु प्रदान किया।

भष्मासुर ने सोचा कि पहले शंकर जी को ही भष्म करके देखता हूँ। भष्मासुर भगवान शंकर के पीछे दौड़ पड़े। भगवान शंकर दौड़ते हुये भगवान विष्णु के पास जा पहुँचे। सो भगवान विष्णु ने मोहिनी स्वरूप धारण कर भष्मासुर का हाथ उसके अपने सिर पर रखवा कर भगवान शंकर की रक्षा की।

इसलिये भगवान शंकर की थोड़ी भी पूजा कर दी जाये तो वह प्रसन्न हो बहुत ज्यादा फल देते हैं। जो शिव पुराण की कथा श्रवण करते हैं उन्हें कपिला गायदान के बराबर फल मिलता है। पुत्रहीन को पुत्र, मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त होता है तथा उस जीव के कोटि जन्म पाप नष्ट हो जाते हैं और शिव धाम की प्राप्ति होती है। इसलिये शिव पुराण कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिये।

जो निरन्तर अनुसंधानपूर्वक इस शिवपुराण को बांचता है अथवा नित्य प्रेमपूर्वक इसका पाठमात्र करता है, वह पुण्यात्मा है –
इसमे संशय नहीं है। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष अन्तकाल मे भक्तिपूर्वक इस पुराण को सुनता है, उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुये भगवान महेश्वर उसे अपना पद (धाम) प्रदान करते हैं। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक इस शिवपुराण का पूजन करता है, वह इस संसार मे सम्पूर्ण भोगों को भोगकर अन्त मे भगवान शिव के पद को प्राप्त कर लेता है। जो प्रतिदिन आलस्यरहित हो रेशमी वस्त्र आदि के वेष्टन से इस शिवपुराण का सत्कार करता है, वह सदा सुखी होता है। यह शिवपुराण निर्मल तथा भगवान शिव का सर्वस्व है; जो इहलोक और परलोक मे भी सुख चाहता हो, उसे आदर के साथ प्रयत्नपूर्वक इसका सेवन करना चाहिये। यह निर्मल एवं उत्तम शिवपुराण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। अत: सदा प्रेमपूर्वक इसका श्रवण एवं विशेष पाठ करना चाहिये।

शिवपुराण पूजा विधि :

पूजा के दिन प्रात: स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर पवित्र हो जायें तत्पश्चात पूजास्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी को पवित्र जल अर्पित करें। शिवलिंग पर मिट्टी के बर्तन में पवित्र जल भरकर ऊपर से बिल्वपत्र, आक व धतूरे के पुष्प, चंदन, चावल आदि के साथ चढायें। यदि नजदीक कोई शिवालय न हो तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा भी की जा सकती है। महाशिवरात्रि पर व्रत के साथ रात्रि जागरण करना चाहिये व शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिये। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बिल्वपत्र का हवन करके व्रत को समाप्त करना चाहिये।

शिवपुराण पूजा के दौरान इन बातों का भी रखें ध्यान :

जो भी शिवपुराण कथा करता है उसे कथा प्रारंभ करने से एक दिन पहले ही व्रत रखने के लिये बाल, नाखून इत्यादि कटवा लेने चाहिये। क्योंकि कथा समाप्ति तक किसी भी प्रकार का क्षौर कर्म नहीं किया जाता। कथा सुनने वाले भी ध्यान रखें कि देर से पचने वाला अर्थात दाल, तला हुआ भोजन, मसूर, बासी अन्न आदि खाकर भी शिवपुराण को नहीं सुनना चाहिये।

कथा श्रोताओं को सबसे पहले कथा वाचक से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। दीक्षा लेने के बाद ब्रह्मचर्य का पालन करना, जमीन पर सोना, पत्तल में खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त होने के बाद ही भोजन करना चाहिये। शिवपुराण कथा का व्रत जो भी लेता है उसे दिन में एक ही बार जौ, तिल या चावल का भोजन ग्रहण करना चाहिये, जिसने सिर्फ कथा सुनने के लिये व्रत किया हो वह प्याज, लहसुन, हींग, गाजर, मादक वस्तुओं का सेवन न करे।

कथा करने वाला काम क्रोध से बचे, ब्राह्मण व साधु-संतो की निंदा भी उसे नहीं करनी चाहिये। गरीब, रोगी, पापी भाग्यहीनएवं नि:संतानों को शिवपुराण की कथा जरुर सुननी चाहिये। कथा समाप्ति को एक उत्सव के रुप में मनाना चाहिये भगवान शिव व शिवपुराण की पूजा करनी चाहिये, कथावाचक की पूजा कर उन्हें दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। कथा सुनने आये ब्राह्मणों का भी आदर सत्कार कर उन्हें भी दान-दक्षिणा दी जानी चाहिये।

शिव पुराण करवाने का मुहुर्त:-

शिव पुराण कथा करवाने के लिये सर्वप्रथम विद्वान ब्राह्मणों से उत्तम मुहुर्त निकलवाना चाहिये। शिव पुराण के लिये श्रावण-भाद्रपद, आश्विन, अगहन, माघ, फाल्गुन, बैशाख और ज्येष्ठ मास विशेष शुभ हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार जिस दिन शिव पुराण कथा प्रारम्भ कर दें, वही शुभ मुहुर्त है।

शिव पुराण का आयोजन कहाँ करें?:-

शिव पुराण करवाने के लिये स्थान अत्यधिक पवित्र होना चाहिये। जन्म भूमि में शिव पुराण करवाने का विशेष महत्व बताया गया है – जननी जन्मभूमिश्चः स्वर्गादपि गरियशी – इसके अतिरिक्त हम तीर्थों में भी शिव पुराण का आयोजन कर विशेष फल प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी जहाँ मन को सन्तोष पहुँचे, उसी स्थान पर कथा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

शिव पुराण करने के नियम:-
शिव पुराण का वक्ता विद्वान ब्राह्मण होना चाहिये। उसे शास्त्रों एवं वेदों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिये। शिव पुराण में सभी ब्राह्मण सदाचारी हों और सुन्दर आचरण वाले हों। वो सन्ध्या बन्धन एवं प्रतिदिन गायत्री जाप करते हों। ब्राह्मण एवं यजमान दोनों ही सात दिनों तक उपवास रखें। केवल एक समय ही भोजन करें। भोजन शुद्ध शाकाहारी होना चाहिये। स्वास्थ्य ठीक न हो तो भोजन कर सकते हैं।

शिव पुराण में कितना धन लगता है?:- Money to Spent on conducting shiv Puran
इस भौतिक युग में बिना धन के कुछ भी सम्भव नहीं एवं बिना धन के धर्म भी नहीं होता। पुराणों में वर्णन है कि पुत्री के विवाह में जितना धन लगे उतना ही धन शिव पुराण में लगाना चाहिये और पुत्री के विवाह में जितनी खुशी हो उतनी ही खुशी मन से शिव पुराण को करना चाहिये।

‘‘विवाहे यादष्शं वित्तं तादष्श्यं परिकल्पयेत’’

#साभार:Bhaktisanskar.Com

नमो निष्कलरूपाय
नमो निष्कलतेजसे।
नम: सकलनाथाय
नमस्ते सकलात्मने।।
नम: प्रणववाच्याय
नम: प्रणवलिङ्गिने।
नम: सृष्टयादिकर्त्रे च
नम: पञ्चमुखाय ते।।

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#संकलित लेख

Monday, August 20, 2018

दक्षिणके जनजाति के गुरू, स्वामी- नारायण गुरुजी

एकात्मता के पुजारी "पू. संत श्री नारायण गुरु"

हिन्दू धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म है; पर छुआछूत और ऊंचनीच जैसी कुरीतियों के कारण हमें नीचा भी देखना पड़ता है। इसका सबसे अधिक प्रकोप किसी समय केरल में था। इससे संघर्ष कर एकात्मता का संचार करने वाले श्री नारायण गुरु का जन्म 20, अगस्त 1856 ई. में तिरुअनंतपुरम् के पास चेम्बा जनती कस्बे में ऐजवा जाति के श्री मदन एवं श्रीमती कुट्टी के घर में हुआ था।

नारायण के पिता अध्यापक एवं वैद्य थे; पर प्राथमिक शिक्षा के बाद कोई व्यवस्था न होने से वे अपने साथियों के साथ गाय चराने जाने लगे। वे इस दौरान संस्कृत श्लोक याद करते रहते थे। कुछ समय बाद वे खेती में भी हाथ बंटाने लगे। 1876 में गुरुकुल में भर्ती होकर उनकी शिक्षा फिर प्रारम्भ हुई।

वे खेलकूद का समय प्रार्थना एवं ध्यान में बिताते थे। स्वास्थ्य खराबी के कारण उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो सकी। घर आकर उन्होंने एक विद्यालय खोल लिया। इसी समय उन्होंने काव्य रचना और गीता पर प्रवचन भी प्रारम्भ कर दिये। उन्होंने गृहस्थ जीवन के बंधन में बंधने से मना कर दिया।

अध्यात्म एवं एकांत प्रेमी नारायण भोजन, आवास और हिंसक पशुओं की चिन्ता किये बिना जंगलों में साधनारत रहते थे। अतः लोग उन्हें चमत्कारी पुरुष मानकर स्वामी जी एवं नारायण गुरु कहने लगे। यह देखकर ईसाई और मुसलमान विद्वानों ने उन्हें धर्मान्तरित करने का प्रयास किया; पर वे सफल नहीं हुए।

1888 में वे नयार नदी के पास अरूबीपुर में साधना करने लगे। वहां उन्होंने शिवरात्रि पर मंदिर बनाने की घोषणा की। आधी रात में भक्तों की भीड़ के बीच वे नदी में से एक शिवलिंग लेकर आये और उसे वैदिक मंत्रों के साथ एक चट्टान पर स्थापित कर दिया। इस प्रकार अरूबीपुर नूतन तीर्थ बन गया। कई लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया कि छोटी जाति के व्यक्ति को मूर्ति स्थापना का अधिकार नहीं है; पर स्वामी जी चुपचाप काम में लगे रहे।

समाज सुधार के अगले चरण के रूप में 100 से अधिक मंदिरों से उन्होंने मदिरा एवं पक्षीबलि से जुड़े देवताओं की मूर्तियां हटवा कर शिव, गणेश और सुब्रह्मण्यम की मूर्तियां स्थापित कीं। उन्होंने नये मंदिर भी बनवाये, जो उद्यान, विद्यालय एवं पुस्तकालय युक्त होते थे। इनके पुजारी तथाकथित छोटी जातियों के होते थे; पर उन्हें तंत्र, मंत्र एवं शास्त्रों का नौ साल का प्रशिक्षण दिया जाता था। मंदिर की आय का उपयोग विद्यालयों में होता था।

दिन भर काम में व्यस्त रहने वालों के लिए रात्रि पाठशालाएं खोली गयीं। अनेक तीर्थों में अनुष्ठानों की उचित व्यवस्था कर पंडों द्वारा की जाने वाली ठगाई को बंद किया। बरकला की शिवगिरी पहाड़ी पर उन्होंने ‘शारदा मठम्’ नामक वैदिक विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर की स्थापना की। इसी प्रकार अलवै में ‘अद्वैत आश्रम’ बनाया।

1924 ई. की शिवरात्रि को स्वामी जी ने अलवै में सर्वधर्म सम्मेलन कर सब धर्मों को जानने का आग्रह किया। वे तर्क-वितर्क और कुतर्क से दूर रहते थे। इससे लोगों के विचार बदलने लगे। ‘वैकोम सत्याग्रह’ के माध्यम से कई मंदिरों एवं उनके पास की सड़कों पर सब जाति वालों का मुक्त प्रवेश होने लगा। इसमें उच्च जातियों के लोग भी सहभागी हुए। यह सुनकर गांधी जी उनसे मिलने आये और उन्हें ‘पवित्र आत्मा’ कहकर सम्मानित किया।

स्वामी जी ने सहभोज, अंतरजातीय विवाह तथा कर्मकांड रहित सस्ते  विवाहों का प्रचलन किया। बाल विवाह तथा वयस्क होने पर कन्या के पिता द्वारा दिये जाने वाले भोज को बंद कराया।

उन्होंने अपने विचारों के प्रसार हेतु ‘विवेक उदयम्’ पत्रिका प्रारम्भ की। 20 सितम्बर, 1928 को एकात्मता के इस पुजारी का देहांत हुआ। केरल में उनके द्वारा स्थापित मंदिर, आश्रम तथा संस्थाएं समाज सुधार के उनके काम को आगे बढ़ा रही हैं।

दक्षिण भारत उपरांत, आज भी अमदावाद (गुजरात) सहित भारत के अन्य प्रांतों में, श्री नारायण गुरु सेवा संस्थान द्वारा, समाज के विभिन्न वर्गों के उत्थान के लिए सेवा कार्य, खासकर शिक्षा के लिए, सेवाकार्य चल रहा है.

दक्षिण भारत के महान समाज सेवी, सभी समाज को एक साथ लेकर चलने वाले, श्री नारायण गुरुजी को बहुत बहुत वंदना.

प्रस्तुति...
महेंद्रभाई  रावल
"शब्द संवाद"