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Sunday, August 26, 2018

योगिनी द्वारा सफलता प्राप्ति

#जय #मांपीताम्बरा #बगलामुखी

माँ पीताम्बरा बगलामुखी के आशीर्वाद सें, अपने जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करे,
अपने सपनों को कैसे साकार कर सकते हैं...
🌹

आप जानते हैं कि.... 10 महाविद्या में मां पीताम्बरा बगलामुखी का एक विशेष स्थान है. माँ पीताम्बरा बगलामुखी, अपने साधकों, उपासकों और भक्तों को कार्यसिध्दि तथा शतृनाश करने के लिए प्रसिद्ध है.
माँ पीताम्बरा बगलामुखी के आसपास एक के बाद एक, 4 आवरण होते हैं. दैनिक पूजा में जो आवरण पूजा होती है वह है...
1) गणपति
2) भैरव
3) योगिनी  और
4) क्षेत्रपाल

यहां, माँ पीताम्बरा बगलामुखी, अपने उपासकों के कार्य, #योगिनी  द्वारा कैसे सिद्ध करती है उसके विशयमें बात करता हूं...

योगिनियां जानती हैं कि आप अपनी उच्चतम उम्मीदों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं क्योंकि देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की योगिनियां और सार्वभौमिक ऊर्जा हमेशा दृश्यों के पीछे काम करती हैं जो आपको आपकी इच्छाओं और आवश्यकताओं, लक्ष्यों को प्रकट करने में मदद करती हैं।

देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की योगिनियां निरंतर आपको शक्तिशाली संकेत दे रहीं हैं कि आप अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलना चाहते हैं और नई दिशाएं ले सकते हैं या नई परियोजनाओं और उद्यमों को शुरू कर सकते हैं।

जिन्हें आप लंबे समय से करना चाहते हैं। दिव्य योगिनियां आपको सहायता देने तथा आपको डर और आशंकाओं को मुक्त करने, आपके जुनून और उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं ।

आपके आसपास उपस्थित ये शक्तियां चाहतीं है कि आप अपने सकारात्मक कौशल पर बने रहें और अपने प्राकृतिक कौशल, प्रतिभा और क्षमताओं का उपयोग अपने और दूसरों के लाभ के लिए करें।

अपनी ऊर्जा को और अधिक बढ़ाने और अपनी योगिनियों को अपने प्रति आकर्षित करने के लिए। आप सकारात्मक प्रतिज्ञान और विज़ुअलाइज़ेशन का उपयोग करें।
जितना अधिक आप सकारात्मक पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तेज़ी से आपके लक्ष्य देवी माँ पीताम्बरा बगलामुखी की इन्हीं योगिनियों द्वारा आपकी वास्तविकता में प्रकट होना आरंभ हो जाएंगे । आप अपने काम में सफलता हासिल कर सकते हैं.

।। जय मां पीताम्बरा बगलामुखी । ।

🔯

#महेन्द्रभाइ  #रावल
#अध्यक्ष
पीताम्बरा पीठ शोध संस्थान
कर्णावती
#गुजरात

Friday, June 29, 2018

सच्चे देशभक्त *धृवानंद सरस्वती*

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*महान् देशभक्त*
आर्यसमाज के आधारस्तंभ
आदरणीय श्री धृवानंदजी सरस्वती...

क्या कोई साधारण रसोइया, कभी किसी राष्ट्रव्यापी संस्था का अध्यक्ष बन सकता है.?

पर अपनी लगन और कर्मठता से जिन्होंने इसे सत्य सिद्ध कर दिखाया, वे थे स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती।

मथुरा (उ.प्र.) के पानीगाँव नामक ग्राम में जन्मे धुरिया नामक बालक को जीवन के 23 वर्ष तक पढ़ने का अवसर ही नहीं मिला। निर्धन और अशिक्षित परिवार में जन्म लेने के कारण कुछ बड़े होते ही उसे पशु चराने के काम में लगा दिया गया।

कुछ दिनों बाद आर्य समाज के स्वामी सर्वानन्दजी उस गांव में आये. युवक की प्रतिभा पहचान कर, उसे अपनी संस्कृत पाठशाला के छात्रावास में भोजन बनाने का काम दे दिया।

बच्चों को संस्कृत पढ़ते देखकर उसके मन में भी पढ़ने की लालसा होती थी; पर उसे भोजनालय में काफी समय लग जाता था। एक बार बहुत संकोच से उसने स्वामी जी को अपनी इच्छा बताई। स्वामी जी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। वे सबके साथ उसे भी पढ़ाने लगे।
उन्होंने उसका नाम धुरेन्द्र रख दिया।

शिक्षा प्रारम्भ होते ही धुरेन्द्र की प्रतिभा प्रकट होने लगी। वह अपने साथियों से सदा आगे दिखायी देते थे। क्रमशः उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से शास्त्री,
जयपुर से नव्य शास्त्र तथा
काशी से दर्शन शास्त्र की उच्च शिक्षा पायी।
इसके बाद वे आगरा में शुद्धि सभा के मन्त्री बने।

समय चलते, वे बंगाल और गुरुकुल बैद्यनाथ धाम, बिहार में प्राचार्य भी रहे। उनकी ख्याति सुनकर शाहपुर नरेश ने अपने युवराज सुदर्शन देव को पढ़ाने के लिए उन्हें बुलाया और राजगुरु का सम्मान दिया। अन्य अनेक राजाओं की ओर से भी उन्हें भरपूर मान सम्मान प्र्राप्त हुआ।

हैदराबाद के क्रूर निजाम के अत्याचारों से हिन्दुओं की मुक्ति हेतु हुए सत्याग्रह में वे 1,500 साथियों के साथ सम्मिलित हुए और जेल की यातनाएँ सहीं। 1946 में जब सिन्ध प्रान्त में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबन्ध लगा, तो इसके विरुद्ध उन्होंने कराची में सत्याग्रह किया।

गान्धी जी के साथ भी वे अनेक बार जेल गये।
7 जुलाई, 1954 को अलीगढ़ के पास स्थित सर्वदानन्द साधु आश्रम में स्वामी आत्मानन्द से संन्यास की दीक्षा लेकर वे राजगुरु धुरेन्द्र शास्त्री से स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती हो गये। तथा तत्कालीन संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष के नाते उन्होंने संगठन में नये प्राण फूँके।।

उनकी विद्वत्ता के कारण देश-विदेश से उन्हें निमन्त्रण आते रहते थे। उन्होंने भारत से बाहर युगाण्डा, जंजीबार,  बर्मा,  मारीशस,  सिंगापुर, थाइलैण्ड आदि देशों में आर्यसमाज एवं हिन्दुत्व का प्रचार किया।

जब आर्यसमाज ने गोहत्या बन्दी के लिए पूरे देश में आन्दोलन चलाया, तो उसकी बागडोर उन्हें ही सौंपी गयी। इसके लिए उन्होंने दिन रात परिश्रम किया। उनकी योग्यता, समर्पण तथा संगठन क्षमता से सब लोग बहुत प्रभावित हुए। आगे चलकर उन्हें आर्यसमाज की सर्वोच्च संस्था ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ का अध्यक्ष बनाया गया।

इस पद पर रहकर उन्होंने विभिन्न इकाइयों में चल रहे विवादों को सुलझाया। वे हर हाल में संगठन हित को ही सर्वोपरि रखते थे। स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती ने संगठन कार्य के लिए अपने स्वास्थ्य की भी चिन्ता नहीं की।

29 जून, 1965 को वे मुम्बई से दिल्ली के लिए अपने आवास से निकले ही थे कि, उन्हें तीव्र हृदयाघात हुआ।

चिकित्सक के आने से पहले ही उनका शरीर छूट गया।

भारत माता के सपूत,  आर्यसमाज के मजबूत स्तंभ आदरणीय श्री धृवानंद सरस्वतीजी को शत शत नमन

🌹

संपादक
*महेंद्रभाई रावल*
शब्द संवाद
गुजरात

Monday, May 14, 2018

ગાયત્રી મંત્ર... એક અદ્ભુત મંત્ર

🌻🌹🌻

*ગાયત્રી મંત્ર એક અદ્ભુત મંત્ર*

🌻

          આપણા પ્રાચીન મંત્રો અને ગ્રંથો કેટલાં બધાં સચોટ અને અર્થપૂર્ણ છે, પરંતુ કમનસીબે ભાગ્યે જ તેને ઓળખવામાં આવે છે. આજના સમયમાં પણ ભાગ્યે જ કોઈ ચોક્કસ રીતે  આ મંત્ર અને ગ્રંથ નાં સાચા અર્થ  સમજતા હોય છે ...

*ગાયત્રી મંત્ર* વિશ્વના સૌથી શક્તિશાળી મંત્રમાં સર્વોચ્ચ સ્થાન ધરાવે છે.

ડૉ. હોવર્ડ સ્ટીઇન્જરલ, *એક અમેરિકન વૈજ્ઞાનિક* ...

આ વૈજ્ઞાનિકે, વિશ્વભરના બધા જ મંત્રો તથા સ્તોત્રોનો ઉંડો અભ્યાસ કર્યો હતો અને  તેમના ફિઝિયોલોજી લેબોરેટરીમાં તેમની તાકાત માટે પરીક્ષણ કર્યું હતું, જેમાં ભારતીય સંસ્કૃતિમાં ઉચ્ચ સ્થાન ધરાવતા....

*હિન્દુ ગાયત્રી મંત્ર* 110,000 સાઉન્ડ તરંગો / સેકન્ડ ...

આ *સૌથી ઊંચો* હતો અને તે વિશ્વમાં સૌથી શક્તિશાળી મંત્ર તરીકે જોવા મળતો હતો.

ચોક્કસ આવર્તનના અવાજ અથવા ધ્વનિ તરંગોના સંયોજન દ્વારા, આ *મહા  મંત્ર* એવો દાવો કરે છે કે તે ચોક્કસ આધ્યાત્મિક ક્ષમતાઓ વિકસાવવા સક્ષમ છે.

હેમ્બર્ગ યુનિવર્સિટીએ સંશોધન શરૂ કર્યું
*ગાયત્રી મંત્રની અસરકારકતા માટે* તની રચનાના *માનસિક શારીરિક અને ભૌતિક સ્તરે*,  આમ બધા સ્તર પર ઉત્તમ સાબિત થઈ છે.

દુનિયાના ઘણા દેશોમાં *ગાયત્રી મંત્ર* દૈનિક ધોરણે, માઇક દ્વારા અથવા રેડિયો પ્રસારિત થાય છે.
પાછલા બે વર્ષથી રેડિયો પૅરેમારિબો, સુરીનામ, દક્ષિણ અમેરિકાથી અને છેલ્લા છ મહિનાથી એમ્સ્ટર્ડમ, હોલેન્ડમાં. જર્મનીના *બોન* શહેરના રેડિયો સ્ટેશન પરથી છેલ્લા 54 કરતાં પણ વધારે વર્ષથી આ ગાયત્રી મંત્ર પ્રસારિત થાય છે.

*ઓમ્ ભુર્ ભુવહઃ સ્વાહઃ*
*તત્ સવિતુર્  વરણ્યમ્*
*ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ*,
*ધિયો યો નઃ પ્રચોદયાત્*

*તેનો અર્થ છે* ....
જે ઈશ્વરનું પવિત્ર તેજ, સ્વર્ગ, મૃત્યુ અને પાતાલ, આ ત્રણેય લોકને  પ્રકાશિત કરે છે, તે દિવ્ય તેજની હું ઉપાસના કરું છું.. તે દિવ્ય તેજ મારી બુધ્ધિને સતેજ બનાવો....

ઉપરોક્ત માહિતી, અમેરિકાના NASA તથા Pentagon જેવી વિશ્વની ટોચની વૈજ્ઞાનિક સંસ્થાના મેગેઝીન માંથી લીધી છે.

 *આપણા શાસ્ત્રો, સંસ્કૃતિ અને વેદ કેટલા બધા સમૃદ્ધ છે* ... !!!

🌻

*મહેન્દ્રભાઈ રાવલ*
*ગુરુજી*

Tuesday, May 8, 2018

*रामचरित मानस में नाम महिमा*

*श्री रामचरित मानस* में
नाम महिमा

*। जपसे जरूर सिध्दि मिलती है*

*जपहिं नाम जन आरत भारी।*
*मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।*


*राम भगत जग चारि प्रकारा।*
*सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।*

*अर्थ-* ( संकट से घबराये हुए ) आर्त भक्त नाम जाप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत् में चार प्रकार के
भक्त हैं...
1. *अर्थार्थी*---धनादि की चाह से भजनेवाले,
2. *आर्त*---संकट की निवृति के लिये भजनेवाले,
3. *जिज्ञासु*---भगवान् को जानने की इच्छा से भजनेवाले,
4. *ज्ञानी*---भगवान् को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजनेवाले.

सभी रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं।

*चहूँ चतुर कहुँ नाम अधारा।*
*ग्यानि प्रभुहिं बिसेषि पिआरा।।*

*चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।*
*कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।*

*अर्थ-*
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों मे नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो ( नाम को छोड़कर ) दूसरा कोई उपाय ही नहीं है।

*संसार में चार प्रकार के भक्त हैं:*

जिज्ञासु, आर्त, अथार्थी और ज्ञानी | जिज्ञासु ब्रह्म की रचना एवं इसके संचालन के रहस्य को जाना कहते हैं | राम-नाम के अभ्यास से इनका आंतरिक विकास हो जाता है जिसके द्वारा इनको ब्रह्म के रहस्य की जानकारी हो जाती है | वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत की जानकारी हासिल करके ब्रह्म के प्रपंच यानी माया के खेल को समझ लेते हैं | इस ज्ञान के कारण ये संसार से विरक्त हो जाते हैं और ब्रह्म से इनका अनुराग पैदा हो जाता है | वे संसार के बीच रहते हुए भी अनुपम सुख का अनुभव करते हैं | आर्त वे हैं जो सांसारिक विपत्ति से पीड़ित या घबराकर राम- नाम के भजन में लगते हैं | उन पर भी परमात्मा की कृपा होती है और उनकी दुःख और पीड़ा ख़त्म हो जाती है | अर्थार्थी वो हैं जो अपनी किसी मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रभु की भक्ति करते हैं |

राम-नाम के अभ्यास से उनकी ,मनोकामना पूरी हो जाती है पर वो फिर भी चौरासी के कैदी ही रहते हैं | इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है | ये तो अंधे कुएं के सामान है, एक पूरी हो तो दस खडी हो जाती हैं | ज्ञानी वो हैं जिनके अन्दर संसार की कोई कामना नहीं होती है | वे सच्चे परमार्थी ज्ञान की प्राप्ति करके मोक्ष पाना चाहते हैं | ऐसे भक्तजन भी राम-नाम के अभ्यास से गूढ़ परमार्थी ज्ञान को प्राप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं |

चारों प्रकार के भक्तों को राम-नाम के अभ्यास द्वारा मनवांछित फल प्राप्त हो जाता है |

तुलसीदास जी समझाते हैं कि इन सब भक्तों में ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष प्रिय होते हैं, क्योंकि उनके अन्दर कोई सांसारिक कामना नहीं होती | वे भक्ति द्वारा अपने परमपिता का ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं | इसी लिए प्रभु के प्यारे होते हैं | जो भक्त सभी सांसारिक कामनाओं को छोड़ कर केवल प्रेम और भक्ति के वश में होकर राम-नाम का अभ्यास करता है, उसका मछली रूपी मन मानों राम-नाम रूपी अमृत-कुंद में निवास करता है | आत्मा शरीर के आवरणों मन के बन्धनों से मुक्त होकर राम-नाम रूपी मानसरोवर में प्रवेश करती है |

*जय श्री राम*

*महेंद्रभाई रावल*
संयोजक
*शब्द संवाद*
गुजरात

Sunday, April 8, 2018

मोक्षका मार्ग - अध्यात्म

पंच कोष ( मोक्ष का विज्ञान )

मानीवय सरंचना को सामान्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जाता है :-
पहला स्थूल शरीर ,
दूसरा सुक्ष्म शरीर।
यदि अधिक गहराई में मानवीय संरचना का विवेचन करना हो तो तीन शरीर कहे जाते हैं:-
पहला-स्थूल शरीर
दूसरा-सूक्ष्म शरीर
तीसरा-कारण शरीर।
यदि मानवीय संरचना का और अधिक गहन अध्ययन करना चाहें तो ऋषि पंच कोष की बात करते हैं ! इन पंच कोषों से मिलकर ही तीन शरीरबनते है। स्थूल शरीर के अंतर्गत अन्नमय कोष आता है। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत प्राणमय व मनोमय कोष आते है। कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय व आनंन्दमय कोष आते हैं!

प्राणमय कोष - प्राणि जगत का अर्थ प्राणमय कोष से है प्राणमय कोष होने के कारण ही वो प्राणी या प्राणधारी कहलाते हैं। अंत समय में प्राण निकलने का अर्थ है प्राणमय कोष का अन्नमय कोष से संबध टूटजाना। प्राणमय कोष का कार्य है अन्नमय कोष का संचालन। जब प्राणमय कोष अन्नमय कोष का संचालन बंद कर देता है तो अन्नमय कोष की सारी गतिविधियाँ रूक जाती है क्योंकि प्राणमय कोष एक प्रकार की उर्जा का भण्डार है जो स्थूल शरीर को चलाती है।जिस प्रकार विद्युत प्रवाह रूकने पर बिजली का उपकरण कार्य करना बंद कर देता है उसी प्रकार प्राणशक्ति के अभाव में स्थूल शरीर के विभिन्न अंग उर्जा विहिन होकर  बेकार हो जाते हैं। जो लोग प्राणमय कोष को ध्यान के माध्यम से देख सकते हैं अथवा अनुभव कर सकते हैं उन्हे बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है। प्राणमय कोष पर नियन्त्रण करना जो लोग जानते हैं वो तरह-तरह के चमत्कार दिखा सकते हैं जैसे इच्छा मृत्यु का वरण, रोगमुक्ति, जमीन के भीतर जड़ समाधि में चले जाना आदि-2। हृदय गति, नाड़ी गति,रक्तचाप आदि को तिब्बत के लामा कम ज्यादा करने के चमत्कार दिखाते हैं वह इसी प्राणमय कोष की सिद्धि से सम्भव है।प्राणमय कोष को सशक्त, संतुलित बनाना प्रत्येक प्राणधारी का कर्तव्य है। विविध प्रकार के श्वास-प्रश्वास के प्रयोग बन्धमुद्राए, अस्वाद व्रत इत्यादि से प्राणमय कोष को जाग्रत किया जा सकता है।

मनोमय कोष:-  जिसमें मनोमय कोष विकसित हो उसे मानव कहा जाता है प्रत्येक प्राणी के गुण धर्म स्वभाव मनोमय कोष के अंर्तगत आते है यदि पाश्चात्य विचारधार अथवा आधुनिक मनीषियों के अनुसार मनोमयकोष का  विवेचन किया जाए तो मनोमयकोष के दो भाग हैं पहला अवचेतन मन व दूसरा चेतन मन। अवचेतन मन तीन प्रकार की (सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी) वृित्तयों, संस्कारों का संग्रह है। व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके अवचेतन मन पर निर्भर करता है यदि अवचेतन मन में भय भरा है तो व्यक्ति व्यर्थ में भयभीत होता रहेगा , यदि लालच भरा है तो लालची होगा, यदि करूणा भरी है तो दयालु होगा। व्यक्ति की प्रकृति का निर्धारण व्यक्ति के अवचेतन मन के आधार पर होता है। चेतन मन के आधार पर वह सही या गलत का निर्णय लेता है, सोचता, समझता है विभिन्न प्रकार के ज्ञानविज्ञान का अध्ययन करता है। इस प्रकार चेतन-अवचेतन दोनों केआधार पर व्यक्ति जीवन व्यतीत करता है  ! अवचेतन भीतर के संस्कारों के आधार पर विनिर्मित है तो चेतन बाहारी वातावरण, बाहारी ज्ञान पर आधरित है यदि भीतर के व्यक्ति के संस्कार गंदे हो व बाहर की संगति भी खराब मिल जाए तो जीवन नरक बन जाता है।भीतर के संस्कार तो प्रारब्ध अथवा भाग्य से आए है जिनको काटना काफी कठिन हो जाता है व मनुष्य के सीधे नियन्त्रण में भी नहीं है परंतु बाहरी वातावरण को व्यक्ति काफी हद तक नियन्त्रित करसकता है स्वयं को अच्छी पुस्तकों अच्छे लोगो के सम्पर्क में रखनेका अधिकाधिक प्रयास करें। गलत विचारो, विषयों का चिन्तन बिल्कुल न करने का प्रयास करें। मन में कुछ न कुछ तो चलता रहेगा जितना हम अच्छा चिन्तन बनाएंगे उतना ही अच्छा चलेगा , इससे अवचेतन मन भी धीरे-2 शुद्ध होता रहेगा।मनोमय कोष एक और प्राणमय कोष का नियन्त्रक है। यदि मनोमयकोष अच्छा नहीं है तो प्राणमयकोष भी अच्छा नहीं होगा। यदि प्राणमय कोष अच्छा नहीं है तो अन्नमयकोष अच्छा नहीं होगा अर्थात व्यक्ति रोगी होगा। प्राणमय कोष को सही करने के कई बार बहुत से प्रयास बेकार चले जाते हैं क्योंकि रोग की जड़ मनोमयकोष में स्थित है। यही कारण है कि बहुत से लोग खाने पीने का ध्यान बहुत रखते हैं ढेर सारे आसन प्राणायाम भी करते है इसके उपंरात भी रोगी बने रहते हैं मनोमय कोष को समझ पाना बहुत जटिलकार्य है ! बहुत से रैकी मास्टर तेजोवलय, अनुभवी प्राणमयकोष का ज्ञान कर पाते है पंरतु मनोमयकोष की जानकारी ले पाना इनकी सामर्थ्य के बाहर की बात होती है। मनोमयकोष को जाग्रत व विकसित कर व्यक्ति वैज्ञानिक, मनीषी, नेता,लेखक दार्शानिक बन सकता है लौकिक जीवन की सभी सफलताएँ मनोमयकोष के ऊपर निर्भर करती हैं!  भारतीय ऋषि मुनियों ने मनोमयकोष के तीन भाग किए है मन, बुद्धि, चित्त ! मनोमयकोष का यह अधिक विस्तृत विवेचन है।
बुद्धि - बुद्धि निर्णय लेने की क्षमता को कहते हैं!
मन- जो विचार व्यक्ति के भीतर चलते रहते हैं, जो वर्तमान काल की मनुष्य की प्रवृति व इच्छाएँ है वो मन के अंर्तगत आती हैं!
चित्त- चित्त में पुराने जन्मों के संस्कारो का संचय रहता है। व्यक्ति का अचानक हृदय परिर्वतन चित्त के आधार पर होता है।
लाहिड़ी महाशय 32 वर्ष तक सामान्य गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर रहे थे।जब उनका स्थानान्तरण रानीखेत हुआ तो अचानक ही वे सामान्य गृहस्थ से महायोगी बन गए, क्योंकि पुर्व जन्म के संस्कार चित्त में योगियों वाले भरे हुए थे। कई बार व्यक्ति का मन प्रबल होता है। जैसे बुद्धि यह निर्णय दे कि ज्वर में मिठाई नहीं खानी है पंरतु मन प्रबल इच्छा करता है व व्यक्ति बिना मीठे खाए नहीं रह पाता क्योंकि मन में त्याग की प्रवृति की कमी है व भोग की प्रबलता है। मनोमयकोष के कमजोर, विकृत होने पर मानव अपना लोकिक जीवन दुख, निराशा, असफलता, रोग, शोक में व्यतीत करता है। अत: मनोमयकोष को निष्काम कर्म, योग, श्रेष्ठ, चिन्तन, मनन आत्मविशेलषण, स्वाध्याय, शुद्ध अन्न, उच्च व दिव्य वातावरण के माध्यम से सशक्त, जाग्रत बनाए रखना बहुत आवश्यक है।विज्ञानमय कोष :- भारतवर्ष में छठी इन्द्रिय अथवा दशम द्वार के बारे में भाँति-2 की ऋद्धि-सिद्धियों के बारे में बहुत सुना जाता है ! ये सब विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आते है। कुण्डलिनी शक्ति का जागरण भी विज्ञानमय कोष के जागरण का ही खेल है ! लौकिक मनुष्य का विज्ञानमयकोष अल्प विकसित होता है क्योंकि इसको विकसित करना दुष्कर कार्य है लौकिक सफलताएँ अर्जित करना इसकी तुलना में आसान होता है क्योकि विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के लिएअधिक संयम, अधिक पुरूषार्थ, तप शक्ति, दिव्य गुणों की आावश्यकता होती है। विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने वाले व्यक्ति को साधक, तपस्वी, देवमानव, सिद्ध पुरूष, योगी, ऋषि आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता है
विज्ञानमय कोष के साधक में प्रज्ञा अर्थात पराज्ञान उपलब्ध होना प्रारम्भ हो जाता है ! वह अपना जीवन दैवी प्रेरणा के आधार पर जीता है। न तो वह अपनी चित्त वृित्तयों का दास होता है न वह बाहरी वातावरण से प्रभावित हो पाता है अपितु अपनी अन्तरात्मा के द्वारा उपलब्ध विशेष ज्ञान द्वारा वह नियन्त्रित, संचालित होता है। सामान्य मानव जहाँ चित्तवृित्तयों का गुलाम होकर रोग, शोक, भोग में लिप्त रहता है वहीं विज्ञानमय कोष का धनी व्यक्ति विभिन्न परालौकिक शक्तियों का स्वामी होता है व दूसरे व्यक्तियों को भी अनुदान वरदान देने की सामर्थ्य रखता है। विज्ञानमय कोष को जाग्रत करने के अधिकारी कम व्यक्ति होते हैं! इसको जाग्रत करने के लिए पहले व्यक्ति किसी बाहरी स्रोत जैसे सदगुरू से प्रेरणा लेकर मनोमय कोष को शुद्ध करने का प्रयास करता है ! चित्त की वृत्तियों की गुलामी छोड़कर अन्तरात्मा की आवाज को सुनने का प्रयास करता है।
मानव के भीतर विभिन्न प्रकार के शक्ति के स्रोत, ज्ञान के स्रोत भरे पड़े हैं उन सभी का अनावरण कर ज्ञानवान, शक्तिवान बनना ही विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत आता है। पुस्तकों द्वारा उपलब्ध ज्ञान व्यक्ति को भटका सकता है परंतु अन्तरात्मा द्वारा उपलब्ध यह ज्ञान बहुत ही पवित्र होता है व साधक को बहुत सन्तुष्ठि, तृप्ति प्रदान करता है। इस कोष के जागरण से विशेषज्ञान, सात लोकों , घटनाचक्रों व समस्त ऋद्धियों-सिद्धियों का विज्ञान प्रकट हो जाता है इसी कारण इस कोष का नाम विज्ञानमयकोष रखा गया है। लौकिक ज्ञान विज्ञान का अर्जन मनोमय कोष के अनावरण से सम्भव है जबकि परालौकिक ज्ञान विज्ञान विज्ञानमयकोष द्वारा सम्भव है।
आनंदमय कोष :- यह कोष परमब्रह्म परमात्मा के सबसे समीप है। परमब्रह्म परमात्मा की तीन विशषताँए है सत् ,चित्त व आंनद। सत् अर्थात सदा अस्तित्व में रहने वाला, चित्त अर्थात चैतन्य अर्थात विभिन्नप्रकार की शक्तियों का मूल तथा आनंद। अपनी इसी तीसरी विशेषता आनन्दमय रहने की प्रवृति के कारण ही वह निर्गुण निराकार मायाप्रकृति के साथ सयुंक्त होकर इस सृष्टि की रचना करता है। एकोहंबहुस्यामि के संकल्प में बंधकर इस विचित्र संसार के रूप में स्वंयको प्रकट करता है। अपनी इसी प्रतृीति से वशीभूत हो योगी मोक्षप्राप्ति का लक्ष्य लेकर ब्रह्मनंद में  निमग्न होकर पुन: उसी तत्वमें विलीन हो जाता है। कैसी अद्भुत लीला है उस परमप्रभु की जो कि बुद्धि की समझ से पूर्णत: बाहर है। निम्न दृष्टांत से हमको समझने में कुछ सहायता अवश्य मिलती है। एक व्यक्ति खाली बैठा बोर हो रहा था। उसने सोचा चलो खेलते है। उसने मुहल्ले के अन्य व्यक्तियों को एकत्र किया व सभी कबड्डी  खेलने लगे। उसमें चोट भी लगी,कपड़े भी फटे पर आनंद बहुत आया। दो घण्टे खेलने के पश्चात् वे पुन: जहाँ-2 से आए थे वहीं चले गए।
कुछ इसी प्रकार का रहस्य नजर आता है सृष्टि की रचना में। प्रत्येक प्राणी वहीं से प्रकट होता है और चाहे अनचाहे अंत में उसी में विलीन हो जाता है। सैदव उत्साहित, उल्लासित, प्रसन्न रहना ही आत्मा का मूल स्वभाव है। उसकी लीला उसी को समर्पित कर सदैव आनंदमय रहना चाहिए। सृष्टि के अधिकाँश रहस्य व विज्ञान मानव मन की समझ से बाहर है।
योगी अथवा साधक अन्नमय कोष को शुद्ध करके प्राणमय कोष को सन्तुलित करते हुए मनोमय कोष को नियन्त्रित करके विज्ञानमय कोष को जाग्रत कर लेता है तब वह आनंदमय कोष में स्वत: ही पहुँच जाता है इस स्थिति को ब्रह्मनंद की संज्ञा देते है! इसे अन्य सभी लौकिक आनंदों की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक बताया गया है। जब योगी को सृष्टि के सारे रहस्य स्पष्ट हो जाते है, वह अनेक प्रकार की शक्तियों का स्वामी हो जाता है तो उसके जीवन में किसी प्रकारका कोई दुख, कष्ट, अभाव नहीं रह जाता। इस स्थिति को ही शास्त्रों में मोक्ष की संज्ञा दी गयी है व इस स्थिति को प्राप्त करना ही मानव जीवन का लक्ष्य बताया गया है। वैज्ञानिकों ने आनंदमय कोष के संबंध में चूहों पर एक प्रयोग किया था। उनका मानना है कि प्राणियों के मस्तिष्क में एक pleasure centre होता है यदि इसको उत्तेजित किया जा सके तो सदा आनंदमय स्थिति में बने रहा जा सकता है !इलैक्ट्राड लगाकर इस केंद्र को उत्तेजित किया गया तो वो बहुत ही आनंदमय हो गए। इस स्थिति में रहने पर वो कुछ भी खाना पीना नहीं चाहते केवल इसी स्थिति में बने रहना चाहते है। संभव है योगी मस्तिष्क के इस केंद्र को उत्तेजित कर सदैव आनंदमय स्थिति में रहते हों।उपरोक्त विवरण मात्र कोषों के दार्शानिक पक्ष पर प्रकाश डालताहै। इन कोषों को सशक्त, जाग्रत, अनावरत करने का विशेष साधन विज्ञान भी है जिसका विवरण देना यहां संभव नहीं है।

।  ॐ शांतिः शांतिः शांतिः  ।

।  ओम् इति एकाक्षरम् बह्म  ।

।  अहम् ब्रह्मास्मि  ।