Tuesday, February 20, 2018

मेरे मित्र - अमित अज्ञेय जी के विचार, जिसके साथ मैं संमत हुं.

#काहे_हम_भक्त_भये

आज के #दैनिक_भास्कर में संपादकीय पृष्ठ पर #द_प्रिंट के एडिटर इन चीफ #शेखर_गुप्ता का विचित्र आलेख पढ़ा।

गुप्ताजी का कहना है कि मोदीजी को बैंकों का राष्ट्रीयकरण रद्द कर देना चाहिए।
इस आलेख में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को #इंदिरा_गांधी की सबसे बड़ी भूल बताया गया है।

एक बात तो आलेख में सही है कि १९६९ में इंदिरा गांधी ने यह कहकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था कि वे सिर्फ धनी लोगों को ऋण दे रहे हैं और गरीब उपेक्षित हैं। किंतु राष्ट्रीयकरण के ५०वें वर्ष में उसी धनी वर्ग ने लोन हजम करके सरकारी बैंकों का भट्टा बैठा दिया।
गरीब या किसान के ऋण बैंक सरकार से वसूली कर लेती है। मध्यमवर्गीय व्यक्ति डरपोक है वो समय से लोन की किस्त जमा कर देता है।
बैंकों के धन का अपहरण होता है बड़े उद्योगपति और रसूखदारों द्वारा जो लोन लेने के बाद आराम से हजम कर लेते हैं और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और वकीलों की फौज लगा कर संविधान को अपनी ही गुत्थियों में उलझाकर देश से बाहर भाग जाते हैं।
कुछ धनपति ब्लैक लिस्टेड होने के बाद भी बार बार सरकारी बैंकों तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं जबकि विजय माल्या जैसे घाघ से निजी बैंकों ने अपना लगभग सारा धन वसूल कर लिया है।

सार्वजनिक क्षेत्र के २१ सरकारी बैंकों की कुल बाजार पूंजी अकेले  उस #HDFC से लगभग ५०००० करोड़ रुपए कम है, जो बमुश्किल २३/२४ वर्ष पहले अस्तित्व में आया है।

कुल मिलाकर बात ये आ रही है कि जिस आम जनता के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था उसे इससे कोई लाभ नहीं मिल सका और धनपतियों की चाँदी हो गई।
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अंशतः सहमति के साथ मैं इस विषय को अलग से देख रहा हूं।
पिछले दो सालों से #NWO का अध्ययन करते हुए मुझे इतना समझ में आ गया है कि फ्रांस सहित समस्त यूरोप में तख्तापलट और खूनी क्रांति के सूत्रधार कुछ निजी बैंक थे।
आजादी के बाद भारत पर भी इनका शिकंजा कसने लगा था। इन लोगों के गुप्त संगठन का अध्ययन हम #इलूमिनाटी #फ्री_मेसन इत्यादि के बारे में लिखी श्रंखलाओं में कर चुके हैं।
जिन्हें रुचि है वे #वैश्विक_एकीकरण श्रंखला को सर्च कर सकते हैं।
इलूमिनाटी वगैरह पर लिखना मैंने इसलिए बंद कर दिया क्योंकि इस पर कुछ कॉपी पेस्ट विद्वानों ने हैरी पॉटर टाइप बकवास लिखकर इसे हास्यास्पद विषय बना दिया है।
शेखर गुप्ता जैसे हाई प्रोफाइल बुद्धिजीवी इस विषय को पहले ही कॉमिक्स कंटेंट मानकर उपेक्षा से मुस्कुराते हैं, ऐसे विद्वानों की कमी फेसबुक पर भी नहीं है।
तथ्य यह है कि आज इलूमिनाटी नामक कोई संगठन नहीं है। किंतु उसके जन्मदाता NWO के माध्यम से अपने एजेंडे पर काम कर रहे हैं और धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं।

इन संगठनों ने बैंकों के माध्यम से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में ले लिया है और आज हालत यह है कि जो देश इनके हिसाब से नहीं चलता वहां ये गृहयुद्ध भड़का देते हैं।
इराक , लेबनान और सीरिया के नैशनल बैंकों ने इनके अधीन आने से इंकार कर दिया था। परिणाम सामने है। #सद्दाम_हुसैन को फांसी, #गद्दाफ़ी को एनकाउंटर और #बशर_अल_असद की जान आफत में है। अमेरिका इनका ऑफिस है और वहां का राष्ट्रपति इनका क्लर्क। #नाटो इनकी सेना है और #संयुक्त_राष्ट्र_संघ इनकी योजना।

भारत में इनकी उपस्थिति #ईस्ट_इंडिया_कंपनी के साथ ही रही है और आज तक है।
गुलामी के समय में अपने एजेंट #ए_ओ_ह्यूम के द्वारा इन्होंने कॉन्ग्रेस की स्थापना करवाई और स्वतंत्रता संग्राम का अपहरण करवाया। आजादी के बाद परिदृश्य से वास्तविक योद्धा गायब कर दिए गए और इन लोगों के एजेंटों को स्वतंत्रता के देवता बना कर हमारे सिर पर बैठा दिया।
किंतु संघ, सुभाष चन्द्र बोस , सावरकर इत्यादि के कारण इनकी योजनाएं द्रुत गति से नहीं चल सकीं। इसका खामियाजा भुगतना पड़ा इन सबको।
इंदिरा गांधी इनके एजेंट नेहरू की पुत्री थीं किन्तु यह पुण्य उनके हिस्से में आना ही चाहिए कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन्होंने इस संगठन की महत्वाकांक्षा पर कुठाराघात कर दिया। इसका परिणाम उन्हें अपने प्राणों से चुकाना पड़ा। किंतु इस हत्या में आप इस संगठन का हाथ प्रमाणित नहीं कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे लिंकन और कैनेडी की हत्याओं में नहीं कर सकते। इंदिरा ने इनसे खुली दुश्मनी क्यों ली ये विषय उनके प्रति घृणा से न देखा जाए तो समझ में आ सकता है। वे अपने बाप की तरह नीच नहीं थीं।

वर्तमान परिदृश्य में सोनिया इनकी एजेंट है किंतु अपने बेवकूफ पुत्र के कारण इन लोगों ने उससे दूरी बनाए रखी है। कॉन्ग्रेस अब इनके काम की नहीं रही। २०१० में इसका पूर्वानुमान करते हुए इस संगठन ने #फोर्ड_फाउंडेशन के माध्यम से #आम_आदमी_पार्टी को बनाया और #केजरीवाल को जननायक का चोला पहनाकर आगे किया।
किंतु यह मोहरा भी पिट गया।

२०१४ के बाद का भारत मोदी का भारत है। संघ और भाजपा इस संगठन की वरीयता सूची में सबसे अंतिम हैं। यूं कहें बहुत मजबूरी है।
वर्तमान मोदी सरकार में ब्यूरोक्रेसी में इनके एजेंट छुपे हुए हैं। सरकार को इस बुरी तरह से घेरे में लिया जा रहा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

ये मात्र मोदी और संघ है जो विष के घूंट पी पी कर अपने लिए रास्ता बना रहे हैं।
शेखर गुप्ता जैसे लोगों का क्या है, वामपंथी बौद्धिक गुंडे इलूमिनाटी ने ही पैदा किए थे, फ्रांस की क्रांति में।

इसलिए मैंने #भक्त होना चुना है।

#अज्ञेय

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