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Tuesday, September 4, 2018

दादाभाइ नवरोजी

दादा भाई नौरोजी

दादा भाई नौरोजी का जन्म चार सितम्बर, 1825 को मुम्बई के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री नौरोजी पालनजी दोर्दी तथा माता श्रीमती मानिकबाई थीं। जब वे छोटे ही थे, तो उनके पिता का देहान्त हो गया; पर उनकी माता ने बड़े धैर्य से उनकी देखभाल की। यद्यपि वे शिक्षित नहीं थीं; पर उनके दिये गये संस्कारों ने दादा भाई के जीवन पर अमिट छाप छोड़ी।

पिता के देहान्त के बाद घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने से इन्हें पढ़ने में कठिनाई आ गयी। ऐसे में उनके अध्यापक श्री मेहता ने सहारा दिया। वे सम्पन्न छात्रों की पुस्तकें लाकर इन्हें देते थे। निर्धन छात्रों की इस कठिनाई को समझने के कारण आगे चलकर दादाभाई निःशुल्क शिक्षा के बड़े समर्थक बने।

11 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हो गया। इनकी योग्यता देखकर मुम्बई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर एर्सकिनपेरी ने इन्हें इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टर बनने को प्रेरित किया; पर कुछ समय पूर्व ही बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैण्ड गये दो पारसी युवकों की मजबूरी का लाभ उठाकर उन्हें ईसाई बना लिया गया था। इस कारण इनके परिवारजनों ने इन्हें वहाँ नहीं भेजा।

आगे चलकर जब ये व्यापार के लिए इंग्लैण्ड गये, तो इन्होंने वहाँ भारतीय छात्रों के भोजन और आवास का उचित प्रबन्ध किया, जिससे किसी को मजबूरी में ईसाई न बनना पड़े। गान्धी जी की इंग्लैण्ड में शिक्षा पूर्ण कराने में दादाभाई का बहुत योगदान था। दादा भाई व्यापार में ईमानदारी के पक्षधर थे। इससे उनके अपनी फर्म के साथ मतभेद उत्पन्न हो गये। अतः वे अपनी निजी फर्म बनाकर व्यापार करने लगे।

अमरीकी गृहयुद्ध के दौरान इन्हें व्यापार में बहुत लाभ हुआ; पर गृहयुद्ध समाप्त होते ही एकदम से बहुत घाटा भी हो गया। बैंकों का भारी कर्ज होने पर दादाभाई ने अपने खाते सार्वजनिक निरीक्षण के लिए खोल दिये। यह पारदर्शिता देखकर बैंकों तथा उनके कर्जदाताओं ने कर्ज माफ कर दिया। कुछ ही समय में उनकी प्रतिष्ठा भारत की तरह इंग्लैण्ड में भी सर्वत्र फैल गयी।

दादाभाई का मत था कि अंग्रेजी शासन को समझाकर ही हम अधिकाधिक लाभ उठा सकते हैं। अतः वे समाचार पत्रों में लेख तथा तर्कपूर्ण ज्ञापनों से शासकों का ध्यान भारतीय समस्याओं की ओर दिलाते रहते थे। जब एक अंग्रेज अधिकारी ए.ओ.ह्यूम ने 27 दिसम्बर, 1885 को मुम्बई में कांग्रेस की स्थापना की, तो दादाभाई ने उसमें बहुत सहयोग दिया। अगले साल कोलकाता में हुए दूसरे अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये।

दादाभाई नौरोजी की इंग्लैण्ड में लोकप्रियता को देखकर उन्हें कुछ लोगों ने इंग्लैण्ड की संसद के लिए चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। शुभचिन्तकों की बात मानकर वे पहली बार चुनाव हारे; पर दूसरे प्रयास में विजयी हुए। इस प्रकार वे भारत तथा इंग्लैण्ड के बीच सेतु बन गये। उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारत से सम्बन्धित अनेक विषय उठाये तथा शासन की गलत नीतियों को बदलवाया। ब्रिटिश शासन के अन्य उपनिवेशों में रहने वाले भारतीयों के अधिकारों के लिए भी उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें रेल की उच्च श्रेणी में यात्रा तथा अंग्रेजों की तरह अच्छे मकानों में रहने की सुविधा दिलायी।

91 वर्ष के सक्रिय जीवन के बाद 20 अगस्त, 1917 को दादाभाई नौरोजी ने आँखें मूँद लीं। पारसी परम्पराओं के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को ‘शान्ति मीनार’ पर विसर्जित कर दिया गया।

इस तरह श्री दादाभाइ नवरोजी एक स्वदेश प्रेमी पारसी, आजकी कोंग्रेस पार्टी के पहले भारतीय - गुजराती प्रमुख और भारतीय व्यापार को विदेश में बढ़ावा देने सज्जन थे.

Sunday, September 2, 2018

क्या आप यह क्रांतिकारियों के नाम जानते हैं.?

अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त

अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय भले ही कांग्रेसी नेता स्वयं लेते हों; पर वस्तुतः इसका श्रेय उन क्रान्तिकारी युवकों को है, जो अपनी जान हथेली पर लेकर घूमते रहते थे। बंगाल ऐसे युवकों का गढ़ था। ऐसे ही दो मित्र थे अनाथ बन्धु प॰जा एवं मृगेन्द्र कुमार दत्त, जिनके बलिदान से शासकों को अपना निर्णय बदलने को विवश होना पड़ा।

उन दिनों बंगाल के मिदनापुर जिले में क्रान्तिकारी गतिविधियाँ जोरों पर थीं। इससे परेशान होकर अंग्रेजों ने वहाँ जेम्स पेड्डी को जिलाधिकारी बनाकर भेजा। यह बहुत क्रूर अधिकारी था। छोटी सी बात पर 10-12 साल की सजा दे देता था। क्रान्तिकारियों ने शासन को चेतावनी दी कि वे इसके बदले किसी भारतीय को यहाँ भेजें; पर शासन तो बहरा था। अतः एक दिन जेम्स पेड्डी को गोली से उड़ा दिया गया।

अंग्रेज इससे बौखला गये। अब उन्होंने पेड्डी से भी अधिक कठोर राबर्ट डगलस को भेजा। एक दिन जब वह अपने कार्यालय में बैठा फाइलें देख रहा था, तो न जाने कहाँ से दो युवक आये और उसे गोली मार दी। वह वहीं ढेर हो गया। दोनों में से एक युवक तो भाग गया; पर दूसरा प्रद्योत कुमार पकड़ा गया। शासन ने उसे फाँसी दे दी।

दो जिलाधिकारियों की हत्या के बाद भी अंग्रेजों की आँख नहीं खुली। अबकी बार उन्होंने बी.ई.जे.बर्ग को भेजा। बर्ग सदा दो अंगरक्षकों के साथ चलता था। इधर क्रान्तिवीरों ने भी ठान लिया था कि इस जिले में किसी अंग्रेज जिलाधिकारी को नहीं रहने देंगे।

बर्ग फुटबाल का शौकीन था और टाउन क्लब की ओर से खेलता था। 2 सितम्बर, 1933 को टाउन क्लब और मौहम्मदन स्पोर्टिंग के बीच मुकाबला था। खेल शुरू होने से कुछ देर पहले बर्ग आया और अभ्यास में शामिल हो गया। अभी बर्ग ने शरीर गरम करने के कलए फुटब१ल में दो-चार किक ही मारी थी कि उसके सामने दो खिलाड़ी,अनाथ बन्धु प॰जा और मृगेन्द्र कुमार दत्त आकर खड़े हो गये। दोनों ने जेब में से पिस्तौल निकालकर बर्ग पर खाली कर दीं। वह हाय कहकर धरती पर गिर पड़ा और वहीं मर गया।

यह देखकर बर्ग के अंगरक्षक इन पर गोलियाँ बरसाने लगे। इनकी पिस्तौल तो खाली हो चुकी थी, अतः जान बचाने के लिए दोनों दौड़ने लगे; पर अंगरक्षकों के पास अच्छे शस्त्र थे। दोनों मित्र गोली खाकर गिर पड़े। अनाथ बन्धु ने तो वहीं प्राण त्याग दिये। मृगेन्द्र को पकड़ कर अस्पताल ले जाया गया। अत्यधिक खून निकल जाने के कारण अगले दिन वह भी चल बसा।

इस घटना के बाद पुलिस ने मैदान को घेर लिया। हर खिलाड़ी की तलाशी ली गयी। निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय के पास भी भरी हुई पिस्तौलें मिलीं। ये तीनों भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य थे। यदि किसी कारण से अनाथ बन्धु और मृगेन्द्र को सफलता न मिलती, तो इन्हें बर्ग का वध करना था। पुलिस ने इन तीनों को पकड़ लिया और मुकदमा चलाकर मिदनापुर के केन्द्रीय कारागार में फाँसी पर चढ़ा दिया।

तीन जिलाधिकारियों की हत्या के बाद अंग्रेजों ने निर्णय किया कि अब कोई भारतीय अधिकारी ही मिदनापुर भेजा जाये। अंग्रेज अधिकारियों के मन में भी भय समा गया था। कोई वहाँ जाने को तैयार नहीं हो रहा था। इस प्रकार क्रान्तिकारी युवकों ने अपने बलिदान से अंग्रेज शासन को झुका दिया।

हमारे देशने ऐसे हजारों युवाओं का बलिदान देकर आजादी प्राप्त की है. सभी क्रांतिवीरों को हार्दिक श्रध्दांजलि  

🌹

Friday, August 10, 2018

करुणानिधि - एक हिन्दू विरोधी नेता

*. Karunanidhi*

                     👹👹        

अभी अभी, लंबे समय तक होस्पिटल में उपचार  और ,  चेन्नई में, मृत्यु के बाद दफनाए गए

"तमिल नेता करुणानिधि की सच्चाई"

उत्तर भारतीय समाज में सिर्फ नाम से पहचाने जाने वाले *तमिल नेता करुणानिधि* के विशय में बहुत से लोगों को सच्चाई मालूम नहीं है. और जो कुछ जानकारी है, वे भी  TV चैनलों या वर्तमान पत्र द्वारा दी गई है...

*चेन्नई* में मेरे मित्र, जो पत्रकारिता तथा TV चैनलों से जुड़े हुए हैं, उसने हमें जो सच्चाई बतायी, वह सुनकर आप दंग रहजाएंगे.

यह जानकारी सच्ची तो है ही, मगर अभी तक कोई मिडिया संस्था ने वह कहनेकी हिम्मत नहीं दिखाई. इससे आप जानसकते हैं कि उनकी कुटिलता का प्रभाव कितना होगा.?
सच्चाई, आपके लिए प्रस्तुत है...

श्री राम, कृष्ण, वेद, पुराण शास्त्र तथा भारतीय संस्कृति के *धोर विरोधी*, करुणनिधि तमिलनाडू के ऐसे नेता थे जिसने, जीवन भर हिन्दू विरोध की राजनीती की !

उन्होंने तमिल लोगों को श्री राम के खिलाफ खूब भड़काया । तथा रावण को महिमा मंडित किया. तमिलनाडु में दशहरा के दिन राम की नींदा और रावण की पूजा की जाती है, वह *करुणानिधि के* कारण.

करुणनिधि ने इसाई, मुस्लिम तथा *हिंदू धर्म विरोधी* सभी संगठनो की पूरी मदद की, रक्षण दिया तथा तमिलनाडु में खूब सेवा की...

वहीँ हिन्दुओ को जीवन भर अपमानित किया,मंदिरों को तोड़ने में साथ दिया, *शंकराचार्य* से लेकर मंदिर के पुजारी तक सभीको परेशान किया.

ऐसे *आततायी*  धर्म विरोधी, राक्षसी नेता *करुणानिधि* की मौत के साथ ही देश से 1 हिन्दू विरोधी नेता कम हुआ. और थोड़ी शांति मिली.

1977 तक DMK नेता हर विजया दशमी को राम-लक्ष्मण सीता और हनुमान जी की मूर्तियों को जूते मार-मारके विषवमन करते थे। इतना धर्म विरोधी है करुणानिधि के सभी चेले...

*भगवान श्री राम जी को "शराबी" और प्रपंची कहने वाले करुणानिधि के प्रति मुझे कुछ भी कोई "करुणा" नही है ।*

हम तो मानते हैं कि, धरती से बोझ कम हुआ । तमिलनाडु का पाप गया । धर्म विरोधी नेता जरूर नर्कमें जाएगा...!

*दूसरे कोई भी व्यक्ति के लिए... "ॐ शांतिः शांतिः शांतिः"... लिखते है,  मगर माफ करना, मै  इस हिंदू  विरोधी,  संस्कृति विरोधी - राम द्रोही के लिए  एक बार भी  "ॐ शांती"   नही बोलूँगा , इसलिए केवल लतांजली*

हिंदू जैसा नाम रखने वाला, *करुणानिधि* देश विरोधि, धर्म द्रोही *मुल्लो की नाजायज औलाद था* इस लिए तो उनको *दफनाया* गया. उसने, तीन तीन स्त्रीयों  के साथ सादी की थी. मोक्ष तो मिलेगी नही *इस राक्षश* को, अब कब्र मे पड़ा पड़ा सड़ता रहेगा।

करुणानिधि वो सक्सहै, जिसने कन्याकुमारी के पास समुद्र में  स्वामी विवेकानंद जी के सम्मान में बनने जाने वाले  "विवेकानंद मेमोरियल"  का धोर विरोध किया था. उतना ही नहीं, मुसलमान तथा ख्रीस्ती लोगोंको विवेकानंद मेमोरियल के विरुद्ध, उकसाने का घृणित काम भी किया था.

DMK के नेता करूणानिधि की कुटिल चालबाजी पर बड़ा खुलासा हुआ था, और ये खुलासा *डॉ सुब्रमण्यम स्वामी* ने किया था.

*रामसेतु* पर करूणानिधि ने तमिलनाडु के मुसलमानो को कहा था कि – तुम चिंता मत करो, हिन्दुओ ने हमारी बाबरी मस्जिद तोड़ी है,  मैं उसका बदला लूंगा और रामसेतु को तोडूंगा ।

और इस काम में *सोनिया गाँधी* ने करूणानिधि का साथ दिया, और जैसे ही 2004 में कांग्रेस (सोनिया गाँधी ) केंद्र की सत्ता में आई, रामसेतु को तोड़े जाने का काम शुरू हो गया..

*परन्तु कोर्ट में मामला जाने, और हिन्दुओ के उग्र विरोध के कारण ये लोग रामसेतु को तोड़ नहीं सके थे।*

रामसेतु तोड़ने के लिए, करूणानिधि के साथ साथ ही सोनिया गाँधी ने भी एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था, और दोनों किसी भी कीमत पर रामसेतु को तोडना चाहते थे.  करूणानिधि ने तो भगवान् राम पर बयानबाजी भी की थी, और कहा था
*राम ने रामसेतु बनाया, इसका क्या सबूत है, राम क्या कोई  इंजीनियर थे..?*

तब अमरीकी वैज्ञानिको ने अपनी *गहन रिसर्च* के बाद साफ़ किया था कि, *रामसेतु बिलकुल सच है,*
हाथों से पत्थरों को अच्छी तरह ठीक करके, इस सेतु को बनाया गया था.

हिन्दू धर्मग्रंथों में जो रामसेतु का जिक्र है, वो बिलकुल सटीक और सच बात है. आज भी रामेश्वर से लेकर श्रीलंका के बीच में रामसेतु के सबूत मौजूद है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रामसेतु को करूणानिधि और सोनिया गाँधी बाबरी मस्जिद का बदला लेकर मुसलमानो को खुश करने के लिए तोड़ने पर तुले हुए थे.  राष्ट्रपति *ए. पी. जे अब्दुल कलाम*  जो इसरो के और विश्व के बड़े वैज्ञानिक भी थे, उसने भी कहा था कि वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक भी राम सेतु, एक सही तथ्य है. परंतु करुणानिधि तथा सोनिया गांधीने यह, मानने से इंकार कर दिया था.... ये खुलासा डॉ स्वामी ने किया था।

- आप ही बताइए, यह सच्चाई किसी भी चैनल या पत्रिका ने आपको बताया है..? इसको कहते हैं *बिकाऊ मिडिया*

🌻

संपादन और प्रस्तुति
*महेंद्रभाई  रावल*
शब्द संवाद
गुजरात

Tuesday, May 8, 2018

લેખક મિત્રનો પત્ર.

*અમેરિકા માં રહેતા મારા લેખક મિત્ર, જેઓ કોંગ્રેસ અને રાહુલ ગાંધીના કેશ-કબાડાથી ખૂબ આહત છે, તેમણે મને મોકલેલ  Massage  વાંચવા લાયક છે....*

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*હા...તમને ચેલેન્જ છે...*

*ભારતના સૌથી લોકપ્રિય પ્રધાનમંત્રી શ્રી નરેન્દ્રભાઈ મોદી પર આક્ષેપ કરતાં પહેલાં..*

પાકિસ્તાનમાં જઈને જરા જોઈ આવો, ચીનને પૂછી આવો, અમેરિકાના તજજ્ઞોનોને/IMF જેવી તમામ વૈશ્વિક સંસ્થાઓના તજજ્ઞોને પૂછી આવો, વર્લ્ડબેંકને/બ્રિક્સ કન્ટ્રીઝના લીડરોને પૂછી આવો, દુનિયાની તમામ MNC ના માથાઓને પૂછી આવો, *ઇઝરાયેલને કે કોઈપણ દેશના વિદેશમંત્રી/વડાપ્રધાનને પૂછી આવો કે મોદી કઈ બલાનું નામ છે......*

*સાલાઓ હાડકા છીનવાઈ જતા હડકાયા થયેલા કુતરાઓ...વિશ્વના એક વિશાળ દેશમાં 60-60 વર્ષ સુધી મચાવેલી લુંટ(૧૯૪૭ માં ૧ ૱=૨ ડોલર વિનિમય દર હતો અને આજે ૬૫ ૱=૧ ડોલર આવું કેમ?) ફક્ત વોટબેન્કો સાચવી રાખવા માટે સબસીડીઓ અને ખેરાતો બાંટી, જાતિવાદ અને ધર્મોના આધારે વિશાળ હુજુમના ભાગલા પાડી અંગ્રેજોની જ નીતિઓ દ્વારા મનઘડત શાસન ચલાવી, પોતાની તીજોરી ભરીછે.*

લાયસન્સ રાજ જેવા તઘલકી ટોટકાઓને દશકાઓ સુધી પંપાળી દેશને દુનિયાથી દશકાઓ પાછળ રાખી દુનિયા સમક્ષ મદારી, બાવાઓ, ભુવાઓ અને ભૂખ્ખડોના દેશની એક સડેલી છબી રજૂ કરી, ખોખલી વિદેશનીતિઓથી અને સરહદો મામલે બેપરવાહ રહી આખા દેશ બની જાય એટલી જમીન ચીન, પાકિસ્તાન અને બાંગ્લાદેશ ને મફતમાં આપી દીધી છે.

*ઇમર્જન્સી લાદી સંવિધાનની ધજીયા ઉડાવી, વીર જવાનોએ રક્ત સીંચી જીતેલા યુદ્ધો બાદ પણ મેળવેલા ભુભાગો પરત કરી કે ગુમાવી એ રક્તનું અપમાન કરી કલ્પી પણ ન શકાય એવું સેનાનું મનોબળ ડાઉન કરી દુશ્મન દેશોના હોંશલાઓની બુલંદીઓને પરવાન ચડાવવાના રાષ્ટ્રદ્રોહ સમકક્ષ ગુનાહો કરી, શ્રીલંકા બાંગ્લાદેશ જેવા ફાલતુ મોરચાઓમાં હજારો સૈનિકોની ફોગટમાં બલી ચડાવી ભારતીય જવાનો ને મરાવી નાખ્યા છે.*

કલ્પના બહારના આજીવન આર્થિક અને માનસિક નુકશાનો વહોરી, જરૂર ન હોય ત્યાં પણ શાંતિના કબુતરો ઉડાડી દેશને દુનિયા સમક્ષ એક માયકાંગલા દેશ તરીકે રજૂ કરવામાં આવ્યો છે.

*આવા અસંખ્ય બખડજંતરો રૂપી અસંખ્ય ખાડાઓ આ મહાન ભારતની છાતીમાં નિર્દય અને બેજવાદારીથી ખોદયે જ રાખ્યા છે ખોદયે જ રાખ્યા છે.. બખડજંતરીયાઓ ઇ* *બધાય..ખાડાઓ ફક્ત ૩ વર્ષમાં કે એક જ ટર્મમાં પુરાઈ જવા જોઈએ એવી તમારી સડેલી ખોપડી જેવી બેફિઝુલ ઈચ્છા રાખો છો એ કેટલે અંશે યોગ્ય છે.*
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*નિવૃત થવાની ઉંમરે 66 વર્ષ નો ડોસો યુવાન ને શરમાવે તેવી સ્ફૂર્તિથી પોતાના કોઈપણ વ્યકિતગત કે પારિવારિક સ્વાર્થ વિના દેશની સકલ બદલવા માટે 18-18 કલાક મહેનત કરે છે..અને તમે 20 વર્ષના યુવાનો વિકાસ ગાંડો થયો છે ના નામે 8-8 કલાક વોટ્સએપમાં બગાડી નાખો છો..શરમ આવવી જોઈએ..*
*દેશ માટે તમેં કાંઈ ના કરો તો કાંઈ નહીં પણ જે કરે છે તેને કરવા દો...તો પણ દેશ સેવા જ છે..*
*કદાચ 100% માંથી 90% કાર્યો સારા હશે અને 10% નહીં કરી શકતા હોય..  તો 90% કામો ને ભૂલી ના જાવ.*

*પાડોશી દેશ ચીન પણ આ ડોસા થી ડરે છે, એ વાત ચીન ને ખબર છે કે ભારત નો વિકાસ ગાંડો થયો છે.*

*કાન ખોલીને સાંભળી લ્યો,*   વિઘ્ન સંતોષીઓ મોદી ત્યાં જ રહેવાનો છે અને *ભારતને ભવ્ય ભારત બનાવવા, વિશ્વમાં મહાન ભારતની વિજયપતાકાઓ લેહરાવવા, આવનારા બે દશકા સુધી.. ત્યાંજ..દિલ્લીની ગાદીએ રહેવાનો છે*....
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*સંપદક*
મહેન્દ્રભાઈ રાવલ
*શબ્દ સંવાદ*

Tuesday, February 20, 2018

मेरे मित्र - अमित अज्ञेय जी के विचार, जिसके साथ मैं संमत हुं.

#काहे_हम_भक्त_भये

आज के #दैनिक_भास्कर में संपादकीय पृष्ठ पर #द_प्रिंट के एडिटर इन चीफ #शेखर_गुप्ता का विचित्र आलेख पढ़ा।

गुप्ताजी का कहना है कि मोदीजी को बैंकों का राष्ट्रीयकरण रद्द कर देना चाहिए।
इस आलेख में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को #इंदिरा_गांधी की सबसे बड़ी भूल बताया गया है।

एक बात तो आलेख में सही है कि १९६९ में इंदिरा गांधी ने यह कहकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था कि वे सिर्फ धनी लोगों को ऋण दे रहे हैं और गरीब उपेक्षित हैं। किंतु राष्ट्रीयकरण के ५०वें वर्ष में उसी धनी वर्ग ने लोन हजम करके सरकारी बैंकों का भट्टा बैठा दिया।
गरीब या किसान के ऋण बैंक सरकार से वसूली कर लेती है। मध्यमवर्गीय व्यक्ति डरपोक है वो समय से लोन की किस्त जमा कर देता है।
बैंकों के धन का अपहरण होता है बड़े उद्योगपति और रसूखदारों द्वारा जो लोन लेने के बाद आराम से हजम कर लेते हैं और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और वकीलों की फौज लगा कर संविधान को अपनी ही गुत्थियों में उलझाकर देश से बाहर भाग जाते हैं।
कुछ धनपति ब्लैक लिस्टेड होने के बाद भी बार बार सरकारी बैंकों तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं जबकि विजय माल्या जैसे घाघ से निजी बैंकों ने अपना लगभग सारा धन वसूल कर लिया है।

सार्वजनिक क्षेत्र के २१ सरकारी बैंकों की कुल बाजार पूंजी अकेले  उस #HDFC से लगभग ५०००० करोड़ रुपए कम है, जो बमुश्किल २३/२४ वर्ष पहले अस्तित्व में आया है।

कुल मिलाकर बात ये आ रही है कि जिस आम जनता के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था उसे इससे कोई लाभ नहीं मिल सका और धनपतियों की चाँदी हो गई।
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अंशतः सहमति के साथ मैं इस विषय को अलग से देख रहा हूं।
पिछले दो सालों से #NWO का अध्ययन करते हुए मुझे इतना समझ में आ गया है कि फ्रांस सहित समस्त यूरोप में तख्तापलट और खूनी क्रांति के सूत्रधार कुछ निजी बैंक थे।
आजादी के बाद भारत पर भी इनका शिकंजा कसने लगा था। इन लोगों के गुप्त संगठन का अध्ययन हम #इलूमिनाटी #फ्री_मेसन इत्यादि के बारे में लिखी श्रंखलाओं में कर चुके हैं।
जिन्हें रुचि है वे #वैश्विक_एकीकरण श्रंखला को सर्च कर सकते हैं।
इलूमिनाटी वगैरह पर लिखना मैंने इसलिए बंद कर दिया क्योंकि इस पर कुछ कॉपी पेस्ट विद्वानों ने हैरी पॉटर टाइप बकवास लिखकर इसे हास्यास्पद विषय बना दिया है।
शेखर गुप्ता जैसे हाई प्रोफाइल बुद्धिजीवी इस विषय को पहले ही कॉमिक्स कंटेंट मानकर उपेक्षा से मुस्कुराते हैं, ऐसे विद्वानों की कमी फेसबुक पर भी नहीं है।
तथ्य यह है कि आज इलूमिनाटी नामक कोई संगठन नहीं है। किंतु उसके जन्मदाता NWO के माध्यम से अपने एजेंडे पर काम कर रहे हैं और धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं।

इन संगठनों ने बैंकों के माध्यम से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में ले लिया है और आज हालत यह है कि जो देश इनके हिसाब से नहीं चलता वहां ये गृहयुद्ध भड़का देते हैं।
इराक , लेबनान और सीरिया के नैशनल बैंकों ने इनके अधीन आने से इंकार कर दिया था। परिणाम सामने है। #सद्दाम_हुसैन को फांसी, #गद्दाफ़ी को एनकाउंटर और #बशर_अल_असद की जान आफत में है। अमेरिका इनका ऑफिस है और वहां का राष्ट्रपति इनका क्लर्क। #नाटो इनकी सेना है और #संयुक्त_राष्ट्र_संघ इनकी योजना।

भारत में इनकी उपस्थिति #ईस्ट_इंडिया_कंपनी के साथ ही रही है और आज तक है।
गुलामी के समय में अपने एजेंट #ए_ओ_ह्यूम के द्वारा इन्होंने कॉन्ग्रेस की स्थापना करवाई और स्वतंत्रता संग्राम का अपहरण करवाया। आजादी के बाद परिदृश्य से वास्तविक योद्धा गायब कर दिए गए और इन लोगों के एजेंटों को स्वतंत्रता के देवता बना कर हमारे सिर पर बैठा दिया।
किंतु संघ, सुभाष चन्द्र बोस , सावरकर इत्यादि के कारण इनकी योजनाएं द्रुत गति से नहीं चल सकीं। इसका खामियाजा भुगतना पड़ा इन सबको।
इंदिरा गांधी इनके एजेंट नेहरू की पुत्री थीं किन्तु यह पुण्य उनके हिस्से में आना ही चाहिए कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन्होंने इस संगठन की महत्वाकांक्षा पर कुठाराघात कर दिया। इसका परिणाम उन्हें अपने प्राणों से चुकाना पड़ा। किंतु इस हत्या में आप इस संगठन का हाथ प्रमाणित नहीं कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे लिंकन और कैनेडी की हत्याओं में नहीं कर सकते। इंदिरा ने इनसे खुली दुश्मनी क्यों ली ये विषय उनके प्रति घृणा से न देखा जाए तो समझ में आ सकता है। वे अपने बाप की तरह नीच नहीं थीं।

वर्तमान परिदृश्य में सोनिया इनकी एजेंट है किंतु अपने बेवकूफ पुत्र के कारण इन लोगों ने उससे दूरी बनाए रखी है। कॉन्ग्रेस अब इनके काम की नहीं रही। २०१० में इसका पूर्वानुमान करते हुए इस संगठन ने #फोर्ड_फाउंडेशन के माध्यम से #आम_आदमी_पार्टी को बनाया और #केजरीवाल को जननायक का चोला पहनाकर आगे किया।
किंतु यह मोहरा भी पिट गया।

२०१४ के बाद का भारत मोदी का भारत है। संघ और भाजपा इस संगठन की वरीयता सूची में सबसे अंतिम हैं। यूं कहें बहुत मजबूरी है।
वर्तमान मोदी सरकार में ब्यूरोक्रेसी में इनके एजेंट छुपे हुए हैं। सरकार को इस बुरी तरह से घेरे में लिया जा रहा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

ये मात्र मोदी और संघ है जो विष के घूंट पी पी कर अपने लिए रास्ता बना रहे हैं।
शेखर गुप्ता जैसे लोगों का क्या है, वामपंथी बौद्धिक गुंडे इलूमिनाटी ने ही पैदा किए थे, फ्रांस की क्रांति में।

इसलिए मैंने #भक्त होना चुना है।

#अज्ञेय

Monday, February 19, 2018

RSS.. संघ के द्वितीय सरसंघचालक

श्री गुरुजी (श्री माधव सदाशिव गोलवलकर)
जन्म दिवस - 19 फरवरी

श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर  "श्री गुरूजी"  का जन्म माघ कृष्ण एकादशी (विजया एकादशी) विक्रम संवत् 1962 तथा दिनांक  19 फरवरी 1906 को प्रातः के साढ़े चार बजे नागपुर के ही श्री रायकर के घर में हुआ।

उनका नाम माधव रखा गया। परन्तु  परिवार के सारे लोग उन्हें मधु नाम से ही सम्बोधित करते थे। बचपन में उनका यही नाम प्रचलित था। ताई-भाऊजी की कुल 9 संतानें हुई थीं। उनमें से केवल मधु ही बचा रहा और अपने माता-पिता की आशा का केन्द्र बना।

डाक्टर जी के बाद श्री गुरुजी संघ के द्वितिय सरसंघचालक बने और उन्होंने यह दायित्व 1973 की 5 जून तक अर्थात लगभग 33 वर्षों तक संभाला। ये 33 वर्ष संघ और राष्ट्र के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।

1942 का भारत छोडो आंदोलन, 1947 में देश का विभाजन तथा खण्डित भारत को मिली राजनीतिक स्वाधीनता, विभाजन के पूर्व और विभाजन के बाद हुआ भीषण रक्तपात, हिन्दू विस्थापितों का विशाल संख्या में हिन्दुस्थान आगमन, कश्मीर पर पाकिस्तान का आक्रमण.

1948 की 30 जनवरी को गांधीजी की हत्या, उसके बाद संघ-विरोधी विष-वमन, हिंसाचार की आंधी और संघ पर प्रतिबन्ध का लगाया जाना, भारत के संविधान का निर्माण और भारत के प्रशासन का स्वरूप व नितियों का निर्धारण, भाषावार प्रांत रचना.

1962 में भारत पर चीन का आक्रमण, पंडित नेहरू का निधन, 1965 में भारत-पाक युद्ध, 1971 में भारत व पाकिस्तान के बिच दूसरा युद्ध और बंगलादेश का जन्म, हिंदुओं के अहिंदूकरण की गतिविधियाँ और राष्ट्रीय जीवन में वैचारिक मंथन आदि अनेकविध घटनाओं से व्याप्त यह कालखण्ड रहा।

इस कालखण्ड में परम पूजनीय श्री गुरुजी ने संघ का पोषण और संवर्धन किया। भारत भर अखंड भ्रमण कर सर्वत्र कार्य को गतिमान किया और स्थान-स्थान पर व्यक्ति- व्यक्ति को जोड़कर सम्पूर्ण भारत में संघकार्य का जाल बिछाया।

विपुल पठन-अध्ययन, गहन चिंतन, आध्यात्मिक साधना व गुरुकृपा, मातृभूमि के प्रति निस्वार्थ समर्पणशीलता, समाज के प्रति असीम आत्मीयता, व्यक्तियों को जोडने की अनुपम कुशलता आदि गुणों के कारण उन्होंने सर्वत्र संगठन को तो मजबूत बनाया ही, साथ ही हर क्षेत्र में देश का परिरक्व वैचारिक मार्गदर्शन भी किया।

संघ के विशुद्ध और प्रेरक विचारों से राष्ट्रजीवन के अंगोपांगों को अभिभूत किये बिना सशक्त, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और सुनिश्चित जीवन कार्य पूरा करने के लिए सक्षम भारत का खड़ा होना असंभव है, इस जिद और लगन से उन्होंने अनेक कार्यक्षेत्रों को प्रेरित किया।

विश्व हिंदू परिषद्, विवेकानंद शिला स्मारक, अखिल भारतीय विद्दार्थी परिषद्, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, शिशु मंदिरों आदि विविध सेवा संस्थाओं के पीछे श्री गुरुजी की ही प्रेरणा रही है। राजनीतिक क्षेत्र में भी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उन्होंने पं. दिनदयाल उपाध्याय जैसा अनमोल हीरा सौंपा।

5 जून, 1973 को इन राष्ट्रऋषी का निधन हुआ.

। भारत माता की जय ।