धर्म - समाज सुधार - राजकारण
*महर्षि दयानन्द के जन्मदिन तथा बोधरात्रि पर्व पर विशेष...*
● अगर महर्षि दयानन्द जी अपने समाज सुधार के काम में सफल हुए होते तो...
*स्वामी सच्चीदानंद* के विचार...
[श्री स्वामी सच्चिदानन्द जी गुजरात के विख्यात संन्यासी, सशक्त वाग्मी, चिन्तक, साहित्यकार, सुधारक, सेवाभावी महानुभाव हैं। वे मूलतः गुजराती हैं। आरम्भ से ही महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज से प्रभावित होते हुए भी वे 'आर्यसमाजी' नहीं हैं। उनका चिन्तन किसी ग्रन्थ से आबद्ध न होकर प्रायः स्वतन्त्र है ]
*अगर दयानन्द जी अपने कार्य में पूर्ण सफल हुए होते तो* -
√ भारत की हिन्दू प्रजा इतनी बलवान हो गई होती कि आज प्रचण्ड बहुमती में होते हुए भी प्रतिदिन उसके मार खाने के समाचार आते हैं वे न आते होते।
√ तो... हज़ारों मन्दिरों में लगाया गया धन विद्या संस्थानों में लगाया गया होता और करोड़ों के भोजन-खर्च के स्थान पर विद्यार्थियों के लिए भोजनालय चलते होते।
√ तो... अस्पृश्यता का नामोनिशान न बचा होता।
√ तो... प्रजा को एक ही परमात्मा की स्पष्ट एवं सरल उपासना प्राप्त हुई होती।
√ तो... प्रचण्ड राष्ट्रवाद और देशप्रेम से यह देश छलक रहा होता।
√ तो... धर्मान्तरित होने का भय नाबूद हो गया होता और हजारों धर्मान्तरित हुए देशबन्धुओं को पुनः आर्य बनाए गए होते। यह प्रक्रिया मात्र धार्मिक प्रक्रिया न रहते हुए उसके दूरगामी परिणाम भी प्राप्त हुए होते।
√ तो... असंख्य व्यक्ति स्वयं को भगवान मान-मनवाकर एकेश्वरवाद में जो उलझन - भ्रम पैदा कर रहे हैं, जिसके कारण हिन्दू प्रजा ईश्वर-पूजक मिटकर व्यक्ति-पूजक हो गई है, वह न होता। इस्लाम की तरह समर्थ में समर्थ व्यक्ति भी सबके साथ ईश्वर-भक्त हुई होती और व्यक्ति-पूजा का भयंकर दूषण न रहा होता।
महर्षि दयानन्द जी, राजा राममोहन राय, महात्मा गांधीजी इत्यादि उस समय के जाग्रत महानुभावों ने प्रजा को जगाने का सच्चा, सरल तथा कल्णाणकारी मार्ग दिखाया था, परन्तु कुछ अपवाद को छोड़कर प्रायः लोग इस मार्ग का स्वीकार न कर सके। कुछ ही समय में फिर से पौराणिक वाद पुनः विस्तरित हो गया। सत्य के बिना उद्धार नहीं है, परन्तु सत्य को ठोकर मारकर दम्भ-पाखण्ड-आडम्बर की ही पूजा करने की आदत हो वहां दुर्दशा को कुछ भी करके रोका नहीं जा सकता।
महात्मा बुद्ध से लेकर कबीर-नानक तक के मानवतावादी महापुरुष और राजा राममोहन राय से लेकर दयानन्द जी और महात्मा गांधीजी तक के सुधारकों ने प्रजा को जगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु कौन जाने क्यों प्रजा नहीं जागी। कदाचित् कुछ समय के लिए थोड़ी जागी, परन्तु शीघ्र ही वह पुनः सो गई। ऐसा लगता है मानों सोने का व्यसन ही हो गया है हमें।
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