Tuesday, May 8, 2018

*रामचरित मानस में नाम महिमा*

*श्री रामचरित मानस* में
नाम महिमा

*। जपसे जरूर सिध्दि मिलती है*

*जपहिं नाम जन आरत भारी।*
*मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।*


*राम भगत जग चारि प्रकारा।*
*सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।*

*अर्थ-* ( संकट से घबराये हुए ) आर्त भक्त नाम जाप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत् में चार प्रकार के
भक्त हैं...
1. *अर्थार्थी*---धनादि की चाह से भजनेवाले,
2. *आर्त*---संकट की निवृति के लिये भजनेवाले,
3. *जिज्ञासु*---भगवान् को जानने की इच्छा से भजनेवाले,
4. *ज्ञानी*---भगवान् को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजनेवाले.

सभी रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं।

*चहूँ चतुर कहुँ नाम अधारा।*
*ग्यानि प्रभुहिं बिसेषि पिआरा।।*

*चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।*
*कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।*

*अर्थ-*
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों मे नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो ( नाम को छोड़कर ) दूसरा कोई उपाय ही नहीं है।

*संसार में चार प्रकार के भक्त हैं:*

जिज्ञासु, आर्त, अथार्थी और ज्ञानी | जिज्ञासु ब्रह्म की रचना एवं इसके संचालन के रहस्य को जाना कहते हैं | राम-नाम के अभ्यास से इनका आंतरिक विकास हो जाता है जिसके द्वारा इनको ब्रह्म के रहस्य की जानकारी हो जाती है | वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत की जानकारी हासिल करके ब्रह्म के प्रपंच यानी माया के खेल को समझ लेते हैं | इस ज्ञान के कारण ये संसार से विरक्त हो जाते हैं और ब्रह्म से इनका अनुराग पैदा हो जाता है | वे संसार के बीच रहते हुए भी अनुपम सुख का अनुभव करते हैं | आर्त वे हैं जो सांसारिक विपत्ति से पीड़ित या घबराकर राम- नाम के भजन में लगते हैं | उन पर भी परमात्मा की कृपा होती है और उनकी दुःख और पीड़ा ख़त्म हो जाती है | अर्थार्थी वो हैं जो अपनी किसी मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रभु की भक्ति करते हैं |

राम-नाम के अभ्यास से उनकी ,मनोकामना पूरी हो जाती है पर वो फिर भी चौरासी के कैदी ही रहते हैं | इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है | ये तो अंधे कुएं के सामान है, एक पूरी हो तो दस खडी हो जाती हैं | ज्ञानी वो हैं जिनके अन्दर संसार की कोई कामना नहीं होती है | वे सच्चे परमार्थी ज्ञान की प्राप्ति करके मोक्ष पाना चाहते हैं | ऐसे भक्तजन भी राम-नाम के अभ्यास से गूढ़ परमार्थी ज्ञान को प्राप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं |

चारों प्रकार के भक्तों को राम-नाम के अभ्यास द्वारा मनवांछित फल प्राप्त हो जाता है |

तुलसीदास जी समझाते हैं कि इन सब भक्तों में ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष प्रिय होते हैं, क्योंकि उनके अन्दर कोई सांसारिक कामना नहीं होती | वे भक्ति द्वारा अपने परमपिता का ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं | इसी लिए प्रभु के प्यारे होते हैं | जो भक्त सभी सांसारिक कामनाओं को छोड़ कर केवल प्रेम और भक्ति के वश में होकर राम-नाम का अभ्यास करता है, उसका मछली रूपी मन मानों राम-नाम रूपी अमृत-कुंद में निवास करता है | आत्मा शरीर के आवरणों मन के बन्धनों से मुक्त होकर राम-नाम रूपी मानसरोवर में प्रवेश करती है |

*जय श्री राम*

*महेंद्रभाई रावल*
संयोजक
*शब्द संवाद*
गुजरात

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