Sunday, August 12, 2018

डॉ. विक्रम साराभाई,- अंतरिक्ष वैज्ञानिक

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महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक,
डा. विक्रम साराभाई

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जिस समय देश अंग्रेजों के चंगुल से स्वतन्त्र हुआ, तब भारत में विज्ञान सम्बन्धी शोध प्रायः नहीं होते थे। गुलामी के कारण लोगों के मानस में यह धारणा बनी हुई थी कि भारतीय लोग प्रतिभाशाली नहीं है। शोध करना या नयी खोज करना इंग्लैण्ड, अमरीका, रूस, जर्मनी, फ्रान्स आदि देशों का काम है। इसलिए मेधावी होने पर भी भारतीय वैज्ञानिक कुछ विशेष नहीं कर पा रहे थे।

पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश का वातावरण बदला। ऐसे में जिन वैज्ञानिकों ने अपने परिश्रम और खोज के बल पर विश्व में भारत का नाम ऊँचा किया, उनमें डा. विक्रम साराभाई का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने न केवल स्वयं गम्भीर शोध किये, बल्कि इस क्षेत्र में आने के लिए युवकों में उत्साह जगाया और नये लोगों को प्रोत्साहन दिया। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम ऐसे ही लोगों में से एक हैं।

डा. साराभाई का जन्म 12 अगस्त, 1919 को कर्णावती (अमदाबाद, गुजरात) में हुआ था। पिता श्री अम्बालाल और माता श्रीमती सरला बाई ने विक्रम को अच्छे संस्कार दिये। उनकी शिक्षा माण्टसेरी पद्धति के विद्यालय से प्रारम्भ हुई। इनकी गणित और विज्ञान में विशेष रुचि थी। वे नयी बात सीखने को सदा उत्सुक रहते थे।

श्री अम्बालाल का सम्बन्ध देश के अनेक प्रमुख लोगों से था। रवीन्द्र नाथ टैगोर,जवाहरलाल नेहरू, डा. चन्द्रशेखर वेंकटरामन और सरोजिनी नायडू जैसे लोग इनके घर पर ठहरते थे। इस कारण विक्रम की सोच बचपन से ही बहुत व्यापक हो गयी।

डा. साराभाई ने अपने माता-पिता की प्रेरणा से बालपन में ही यह निश्चय कर लिया कि उन्हें अपना जीवन विज्ञान के माध्यम से देश और मानवता की सेवा में लगाना है। स्नातक की शिक्षा के लिए वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये और 1939 में‘नेशनल साइन्स ऑफ ट्रिपोस’ की उपाधि ली।

द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने पर वे भारत लौट आये और बंगलौर में प्रख्यात वैज्ञानिक डा. चन्द्रशेखर वेंकटरामन के निर्देशन में प्रकाश सम्बन्धी शोध किया। इसकी चर्चा सब ओर होने पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.एस-सी. की उपाधि से सम्मानित किया। अब उनके शोध पत्र विश्वविख्यात शोध पत्रिकाओं में छपने लगे।

अब उन्होंने कर्णावती (अमदाबाद) के डाइकेनाल और त्रिवेन्द्रम स्थित अनुसन्धान केन्द्रों में काम किया। उनका विवाह प्रख्यात नृत्यांगना मृणालिनी देवी से हुआ। उनकी विशेष रुचि अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में थी। वे चाहते थे कि भारत भी अपने उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज सके। इसके लिए उन्होंने त्रिवेन्द्रम के पास थुम्बा और श्री हरिकोटा में राकेट प्रक्षेपण केन्द्र स्थापित किये।

डा. साराभाई भारत के ग्राम्य जीवन को विकसित देखना चाहते थे। ‘नेहरू विकास संस्थान’ के माध्यम से उन्होंने गुजरात की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह देश-विदेश की अनेक विज्ञान और शोध सम्बन्धी संस्थाओं के अध्यक्ष और सदस्य थे। अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने के बाद भी वे गुजरात विश्वविद्यालय में भौतिकी के शोध छात्रों को सदा सहयोग करते रहे।

डा. साराभाई 20 दिसम्बर, 1971 को अपने साथियों के साथ थुम्बा गये थे। वहाँ से एक राकेट का प्रक्षेपण होना था। दिन भर वहाँ की तैयारियाँ देखकर वे अपने होटल में लौट आये; पर उसी रात में अचानक उनका देहान्त हो गया।

भारत माताने अपना एक आंतराष्टीय ख्याति प्राप्त, अंतरिक्ष वैज्ञानिक, शांत और सुशील, दीर्घ द्रष्टि वाले, सपूत को खो दिया.  मगर उसने अपने पीछे, अपने ही समान मेधावी, महेनती और देशभक्त वैज्ञानिकों का एक समूह तैयार किया था. जो भारत को अंतरिक्ष विज्ञान तथा मिसाइल टेक्नोलॉजी में ओर आगे बढ़ने में समर्थ और सक्षम था.

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Friday, August 10, 2018

करुणानिधि - एक हिन्दू विरोधी नेता

*. Karunanidhi*

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अभी अभी, लंबे समय तक होस्पिटल में उपचार  और ,  चेन्नई में, मृत्यु के बाद दफनाए गए

"तमिल नेता करुणानिधि की सच्चाई"

उत्तर भारतीय समाज में सिर्फ नाम से पहचाने जाने वाले *तमिल नेता करुणानिधि* के विशय में बहुत से लोगों को सच्चाई मालूम नहीं है. और जो कुछ जानकारी है, वे भी  TV चैनलों या वर्तमान पत्र द्वारा दी गई है...

*चेन्नई* में मेरे मित्र, जो पत्रकारिता तथा TV चैनलों से जुड़े हुए हैं, उसने हमें जो सच्चाई बतायी, वह सुनकर आप दंग रहजाएंगे.

यह जानकारी सच्ची तो है ही, मगर अभी तक कोई मिडिया संस्था ने वह कहनेकी हिम्मत नहीं दिखाई. इससे आप जानसकते हैं कि उनकी कुटिलता का प्रभाव कितना होगा.?
सच्चाई, आपके लिए प्रस्तुत है...

श्री राम, कृष्ण, वेद, पुराण शास्त्र तथा भारतीय संस्कृति के *धोर विरोधी*, करुणनिधि तमिलनाडू के ऐसे नेता थे जिसने, जीवन भर हिन्दू विरोध की राजनीती की !

उन्होंने तमिल लोगों को श्री राम के खिलाफ खूब भड़काया । तथा रावण को महिमा मंडित किया. तमिलनाडु में दशहरा के दिन राम की नींदा और रावण की पूजा की जाती है, वह *करुणानिधि के* कारण.

करुणनिधि ने इसाई, मुस्लिम तथा *हिंदू धर्म विरोधी* सभी संगठनो की पूरी मदद की, रक्षण दिया तथा तमिलनाडु में खूब सेवा की...

वहीँ हिन्दुओ को जीवन भर अपमानित किया,मंदिरों को तोड़ने में साथ दिया, *शंकराचार्य* से लेकर मंदिर के पुजारी तक सभीको परेशान किया.

ऐसे *आततायी*  धर्म विरोधी, राक्षसी नेता *करुणानिधि* की मौत के साथ ही देश से 1 हिन्दू विरोधी नेता कम हुआ. और थोड़ी शांति मिली.

1977 तक DMK नेता हर विजया दशमी को राम-लक्ष्मण सीता और हनुमान जी की मूर्तियों को जूते मार-मारके विषवमन करते थे। इतना धर्म विरोधी है करुणानिधि के सभी चेले...

*भगवान श्री राम जी को "शराबी" और प्रपंची कहने वाले करुणानिधि के प्रति मुझे कुछ भी कोई "करुणा" नही है ।*

हम तो मानते हैं कि, धरती से बोझ कम हुआ । तमिलनाडु का पाप गया । धर्म विरोधी नेता जरूर नर्कमें जाएगा...!

*दूसरे कोई भी व्यक्ति के लिए... "ॐ शांतिः शांतिः शांतिः"... लिखते है,  मगर माफ करना, मै  इस हिंदू  विरोधी,  संस्कृति विरोधी - राम द्रोही के लिए  एक बार भी  "ॐ शांती"   नही बोलूँगा , इसलिए केवल लतांजली*

हिंदू जैसा नाम रखने वाला, *करुणानिधि* देश विरोधि, धर्म द्रोही *मुल्लो की नाजायज औलाद था* इस लिए तो उनको *दफनाया* गया. उसने, तीन तीन स्त्रीयों  के साथ सादी की थी. मोक्ष तो मिलेगी नही *इस राक्षश* को, अब कब्र मे पड़ा पड़ा सड़ता रहेगा।

करुणानिधि वो सक्सहै, जिसने कन्याकुमारी के पास समुद्र में  स्वामी विवेकानंद जी के सम्मान में बनने जाने वाले  "विवेकानंद मेमोरियल"  का धोर विरोध किया था. उतना ही नहीं, मुसलमान तथा ख्रीस्ती लोगोंको विवेकानंद मेमोरियल के विरुद्ध, उकसाने का घृणित काम भी किया था.

DMK के नेता करूणानिधि की कुटिल चालबाजी पर बड़ा खुलासा हुआ था, और ये खुलासा *डॉ सुब्रमण्यम स्वामी* ने किया था.

*रामसेतु* पर करूणानिधि ने तमिलनाडु के मुसलमानो को कहा था कि – तुम चिंता मत करो, हिन्दुओ ने हमारी बाबरी मस्जिद तोड़ी है,  मैं उसका बदला लूंगा और रामसेतु को तोडूंगा ।

और इस काम में *सोनिया गाँधी* ने करूणानिधि का साथ दिया, और जैसे ही 2004 में कांग्रेस (सोनिया गाँधी ) केंद्र की सत्ता में आई, रामसेतु को तोड़े जाने का काम शुरू हो गया..

*परन्तु कोर्ट में मामला जाने, और हिन्दुओ के उग्र विरोध के कारण ये लोग रामसेतु को तोड़ नहीं सके थे।*

रामसेतु तोड़ने के लिए, करूणानिधि के साथ साथ ही सोनिया गाँधी ने भी एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था, और दोनों किसी भी कीमत पर रामसेतु को तोडना चाहते थे.  करूणानिधि ने तो भगवान् राम पर बयानबाजी भी की थी, और कहा था
*राम ने रामसेतु बनाया, इसका क्या सबूत है, राम क्या कोई  इंजीनियर थे..?*

तब अमरीकी वैज्ञानिको ने अपनी *गहन रिसर्च* के बाद साफ़ किया था कि, *रामसेतु बिलकुल सच है,*
हाथों से पत्थरों को अच्छी तरह ठीक करके, इस सेतु को बनाया गया था.

हिन्दू धर्मग्रंथों में जो रामसेतु का जिक्र है, वो बिलकुल सटीक और सच बात है. आज भी रामेश्वर से लेकर श्रीलंका के बीच में रामसेतु के सबूत मौजूद है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रामसेतु को करूणानिधि और सोनिया गाँधी बाबरी मस्जिद का बदला लेकर मुसलमानो को खुश करने के लिए तोड़ने पर तुले हुए थे.  राष्ट्रपति *ए. पी. जे अब्दुल कलाम*  जो इसरो के और विश्व के बड़े वैज्ञानिक भी थे, उसने भी कहा था कि वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक भी राम सेतु, एक सही तथ्य है. परंतु करुणानिधि तथा सोनिया गांधीने यह, मानने से इंकार कर दिया था.... ये खुलासा डॉ स्वामी ने किया था।

- आप ही बताइए, यह सच्चाई किसी भी चैनल या पत्रिका ने आपको बताया है..? इसको कहते हैं *बिकाऊ मिडिया*

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संपादन और प्रस्तुति
*महेंद्रभाई  रावल*
शब्द संवाद
गुजरात

Thursday, August 9, 2018

ऐतिहासिक काकोरी कांड क्या है.?

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काकोरी कांड का ऐतिहासिक दिन

9 अगस्त, 1925

9 अगस्त 1925 को रेल से ले जाये जा रहे सरकारी खजाने को क्रान्तिकारियों द्वारा लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन के पास लूट लिया था। यह कांड​ काकोरी काण्ड के नाम से ​ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के​ ईतिहास मे प्रसिद्ध है.

क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की खतरनाक मंशा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने के लिए  पूरी योजना बनाई गयी ​वह स्वतंत्रता संग्राम का तब तक का सबसे दुस्साहसी कारनामा था जिससे अंग्रेज सरकार सकते में आ गई थी.

कल्पना करिए, अंग्रेजों के खजाने को लूट लेना वह भी चलती रेल से और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर कितने साहस, शौर्य, संकल्प और सुनियोजिम रणनीति की जरुरत होगी वह भी अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं. क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के ​लिए थी.

शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने ​9 ​अगस्त ​1925 ​को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी...

"आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व ​6 अन्य सहयोगियों की मदद से गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया.

पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए.

मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी. वह मौके पर ही ढेर हो गया. शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गई.

अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह खबर पूरे संसार में फैल गयी. ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और सी०आई०डी० इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया.

अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल​40  क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड की सजा सुनायी गयी.

इस मुकदमें में ​16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ​4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी का दण्ड दिया गया था.

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संपादन
महेंद्रभाई रावल

Wednesday, August 8, 2018

महाराजा कृष्णदेव राय - विजयानगरम् साम्राज्य

प्रतापी राजा कृष्णदेव राय
और
विजयानगरम् साम्राज्य

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एक के बाद एक,  लगातार हमले कर विदेशी मुस्लिमों ने भारत के उत्तर में अपनी जड़े जमा ली थीं। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को एक बड़ी सेना देकर दक्षिण भारत जीतने के लिए भेजा। 1306 से 1315 ई. तक इसने दक्षिण में भारी विनाश किया।

ऐसी विकट परिस्थिति में हरिहर और बुक्का राय नामक दो वीर भाइयों ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की।

इन दोनों को बलात् मुसलमान बना लिया गया था; पर माधवाचार्य ने इन्हें वापस हिन्दू धर्म में लाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करायी।

लगातार युद्धरत रहने के बाद भी यह राज्य विश्व के सर्वाधिक धनी और शक्तिशाली राज्यों में गिना जाता था। इस राज्य के सबसे प्रतापी राजा हुए कृष्णदेव राय। उनका राज्याभिषेक 8 अगस्त, 1509 को हुआ था।

महाराजा कृष्णदेव राय हिन्दू परम्परा का पोषण करने वाले लोकप्रिय सम्राट थे। उन्होंने अपने राज्य में हिन्दू एकता को बढ़ावा दिया। वे स्वयं वैष्णव पन्थ को मानते थे; पर उनके राज्य में सब पन्थों के विद्वानों का आदर होता था। सबको अपने मत के अनुसार पूजा करने की छूट थी।

उनके काल में भ्रमण करने आये विदेशी यात्रियों ने अपने वृत्तान्तों में विजयनगर साम्राज्य की भरपूर प्रशंसा की है। इनमें पुर्तगाली यात्री डोमिंगेज पेइज प्रमुख है।

महाराजा कृष्णदेव राय ने अपने राज्य में आन्तरिक सुधारों को बढ़ावा दिया। शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर तथा राजस्व व्यवस्था में सुधार कर उन्होंने राज्य को आर्थिक दृष्टि से सबल और समर्थ बनाया।

विदेशी और विधर्मी हमलावरों का संकट राज्य पर सदा बना रहता था, अतः उन्होंने एक विशाल और तीव्रगामी सेना का निर्माण किया। इसमें सात लाख पैदल, 22,000 घुड़सवार और 651 हाथी थे।

महाराजा कृष्णदेव राय को अपने शासनकाल में सबसे पहले बहमनी सुल्तान महमूद शाह के आक्रमण का सामना करना पड़ा। महमूद शाह ने इस युद्ध को ‘जेहाद’ कह कर सैनिकों में मजहबी उन्माद भर दिया; पर कृष्णदेव राय ने ऐसा भीषण हमला किया कि महमूद शाह और उसकी सेना सिर पर पाँव रखकर भागी।

इसके बाद उन्होंने कृष्णा और तुंगभद्रा नदी के मध्य भाग पर अधिकार कर लिया। महाराजा की एक विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने जीवन में लड़े गये हर युद्ध में विजय प्राप्त की।

महमूद शाह की ओर से निश्चिन्त होकर राजा कृष्णदेव राय ने उड़ीसा राज्य को अपने प्रभाव क्षेत्र में लिया और वहाँ के शासक को अपना मित्र बना लिया। 1520 में उन्होंने बीजापुर पर आक्रमण कर सुल्तान यूसुफ आदिलशाह को बुरी तरह पराजित किया।

उन्होंने गुलबर्गा के मजबूत किले को भी ध्वस्त कर आदिलशाह की कमर तोड़ दी। इन विजयों से सम्पूर्ण दक्षिण भारत में कृष्णदेव राय और हिन्दू धर्म के शौर्य की धाक जम गयी।

महाराजा के राज्य की सीमाएँ पूर्व में विशाखापट्टनम, पश्चिम में कोंकण और दक्षिण में भारतीय प्रायद्वीप के अन्तिम छोर तक पहुँच गयी थीं। हिन्द महासागर में स्थित कुछ द्वीप भी उनका आधिपत्य स्वीकार करते थे।

राजा द्वारा लिखित‘आमुक्त माल्यदा’ नामक तेलुगू ग्रन्थ प्रसिद्ध है। राज्य में सर्वत्र शान्ति एवं सुव्यवस्था के कारण व्यापार और कलाओं का वहाँ खूब विकास हुआ।

उन्होंने विजयनगर में भव्य राम मन्दिर तथा हजार मन्दिर (हजार खम्भों वाले मन्दिर) का निर्माण कराया। ऐसे वीर एवं न्यायप्रिय शासक को हम प्रतिदिन एकात्मता स्तोत्र में श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

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महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद

Wednesday, August 1, 2018

लोकमान्य तिलक - एक विरल व्यक्तित्व

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स्वतन्त्रता आंदोलन में
उग्रवाद के प्रणेता
लोकमान्य तिलक

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में एक मंच के रूप में कार्यरत कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था।

पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर #लाल-बाल-पाल नामक जो त्रयी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।

#लाल = लाला लाजपतराय,
बाल = बाल गंगाधर तिलक,
पाल = बिपिन चंद्र पाल

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को रत्नागिरी, महाराष्ट्र के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी।

वे भारत में अंग्रेजों के शासन को अभिशाप समझते थे तथा इसे उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी मार्ग को गलत नहीं मानते थे। इन विचारों के कारण पूना में हजारों युवक उनके सम्पर्क में आये। इनमें चाफेकर बन्धु प्रमुख थे। तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने पूना के कुख्यात प्लेग कमिश्नर रैण्ड का वध किया और तीनों भाई फाँसी चढ़ गये।

सन 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग, अकाल और भूकम्प का संकट एक साथ आ गया। लेकिन दुष्ट अंग्रेजों ने ऐसे में भी जबरन लगान की वसूली जारी रखी। इससे तिलक जी का मन उद्वेलित हो उठा। उन्होंने इसके विरुद्ध जनता को संगठित कर आन्दोलन छेड़ दिया। नाराज होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें 18 मास की सजा दी। तिलक जी ने जेल में अध्ययन का क्रम जारी रखा और बाहर आकर फिर से आन्दोलन में कूद गये।

तिलक जी एक अच्छे पत्रकार भी थे। उन्होंने अंग्रेजी में ‘मराठा’ तथा मराठी में ‘केसरी’ साप्ताहिक अखबार निकाला। इसमें प्रकाशित होने वाले विचारों से पूरे महाराष्ट्र और फिर देश भर में स्वतन्त्रता और स्वदेशी की ज्वाला भभक उठी।

युवक वर्ग तो तिलक जी का दीवाना बन गया। लोगों को हर सप्ताह केसरी की प्रतीक्षा रहती थी। अंग्रेज इसके स्पष्टवादी सम्पादकीय आलखों से तिलमिला उठे। बंग-भंग के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के पक्ष में तिलक जी ने खूब लेख छापे। जब खुदीराम बोस को फाँसी दी गयी, तो तिलक जी ने केसरी में उसे भावपूर्ण श्रद्धा॰जलि दी।

अंग्रेज तो उनसे चिढ़े ही हुए थे। उन्होंने तिलक जी को कैद कर छह साल के लिए बर्मा की माण्डले जेल में भेज दिया। वहाँ उन्होंने ‘गीता रहस्य’नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी।

तिलक जी समाज सुधारक भी थे। वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में वे सरकारी हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने जनजागृति के लिए महाराष्ट्र में गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव की परम्परा शुरू की, जो आज विराट रूप ले चुकी है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में उग्रवाद के प्रणेता तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह माँगने से नहीं मिलेगी। अतः उन्होंने नारा दिया – स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे।

वे वृद्ध होने पर भी स्वतन्त्रता के लिए भागदौड़ में लगे रहे। जेल की यातनाओं तथा मधुमेह से उनका शरीर जर्जर हो चुका था। मुम्बई में अचानक वे निमोनिया बुखार से पीड़ित हो गये। अच्छे से अच्छे इलाज के बाद भी वे सँभल नहीं सके और एक अगस्त, 1920 को मुम्बई में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली।

श्री लोकमान्य तिलक हम सभी भारतीयों को, आदरणीय और आदर्श मार्गदर्शक के रूप में आज भी प्रेरणा दे रहे हैं.

।  वंदे भारत मातरम् 

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महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद
गुजरात

Tuesday, July 31, 2018

हिंदी साहित्यकार - मुन्शी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचन्द
आधुनिक युग के श्रेष्ठ साहित्यकार

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था। उनका जन्म ग्राम लमही (वाराणसी, उ.प्र.) में 31 जुलाई, 1880 को हुआ था। घर में उन्हें नवाब कहते थे।

उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्र में मुस्लिम प्रभाव के कारण बोलचाल में प्रायः लोग उर्दू का प्रयोग करते थे। उन दिनों कई स्थानों पर पढ़ाई भी मदरसों में ही होती थी। इसीलिए 13 वर्ष की अवस्था तक वे उर्दू माध्यम से ही पढ़े। इसके बाद उन्होंने हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखा।

1898 में कक्षा दस उत्तीर्ण कर वे चुनार में सरकारी अध्यापक बन गये। उन दिनों वहां एक गोरी पल्टन भी रहती थी। एक बार अंग्रेज दल और विद्यालय के दल का फुटब१ल मैच हो रहा था। विद्यालय वाले दल के जीतते ही छात्र उत्साहित होकर शोर करने लगे। इस पर एक गोरे सिपाही ने एक छात्र को लात मार दी। यह देखते ही धनपतराय ने मैदान की सीमा पर लगी झंडी उखाड़ी और उस सिपाही को पीटने लगे। यह देखकर छात्र भी मैदान में आ गये। छात्र और उनके अध्यापक का रोष देखकर अंग्रेज खिलाड़ी भाग खड़े हुए।

प्रेमचंद छुआछूत, ऊंचनीच, जातिभेद आदि के घोर विरोधी थे। अपनी पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने एक बाल विधवा शिवरानी से पुनर्विवाह किया।

वे बाल गंगाधर तिलक तथा गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। युवकों में क्रांतिकारी चेतना का संचार करने के लिए उन्होंने इटली के स्वाधीनता सेनानी मैजिनी और गैरीबाल्डी तथा स्वामी विवेकानंद की छोटी जीवनियां लिखीं।

अध्यापन के साथ पढ़ाई करते हुए उन्होंने बी.ए कर लिया। अब उनकी नियुक्ति हमीरपुर में जिला विद्यालय उपनिरीक्षक के पद पर हो गयी। इस दौरान उन्होेंने देशभक्ति की अनेक कहानियां लिखकर उनका संकलन ‘सोजे वतन’ के नाम से प्रकाशित कराया। इसमें उन्होंने अपना नाम ‘नवाबराय’लिखा था।

जब शासन को इसका पता लगा, तो उन्होंने नवाबराय को बुलवा भेजा। जिलाधीश ने उन्हें इसके लिए बहुत फटकारा और पुस्तक की सब प्रतियां जब्त कर जला दीं। जिलाधीश ने यह शर्त भी लगाई कि उनकी अनुमति के बिना अब वे कुछ नहीं लिखेंगे। नवाबराय लौट तो आये; पर बिना लिखे उन्हें चैन नहीं पड़ता था। अतः उन्होंने अपना लेखकीय नाम ‘प्रेमचंद’ रख लिया।

प्रेमचंद अब तक उर्दू में लिखते थे; पर अब उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को बनाया।

उन्होंने अपने कमरे में क्रांतिवीर खुदीराम बोस का चित्र लगा लिया, जिसे कुछ दिन पूर्व ही फांसी दी गयी थी। उन दिनों रूस में समाजवादी क्रांति हुई थी। प्रेमचंद के मन पर उसका भी प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपने ‘प्रेमाश्रम’ नामक उपन्यास में उसकी प्रशंसा की।

प्रेमचंद जनता को विदेशी शासकों के साथ ही जमींदार और पंडे-पुजारियों जैसे शोषकों से भी मुक्त कराना चाहते थे। वे स्वयं को इस स्वाधीनता संग्राम का एक सैनिक समझते थे, जिसके हाथ में बंदूक की जगह कलम है। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को आधार बनाकर ‘कर्मभूमि’ नामक उपन्यास भी लिखा।

प्रेमचंद की रचनाओं में जन-मन की आकांक्षा प्रकट होती थी। आम बोलचाल की भाषा में होने के कारण उनकी कहानियां आज भी बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। उनके कई उपन्यासों पर फिल्म भी बनी हैं।

देशप्रेमी, सरल और संतोषी स्वभाव के प्रेमचंद का आठ अक्तूबर, 1936 को निधन हुआ। आज भी मुन्शी प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में विशेष रूप से स्थान दिया जाता है...

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महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद
गुजरात