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Wednesday, August 1, 2018

लोकमान्य तिलक - एक विरल व्यक्तित्व

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स्वतन्त्रता आंदोलन में
उग्रवाद के प्रणेता
लोकमान्य तिलक

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में एक मंच के रूप में कार्यरत कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था।

पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर #लाल-बाल-पाल नामक जो त्रयी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।

#लाल = लाला लाजपतराय,
बाल = बाल गंगाधर तिलक,
पाल = बिपिन चंद्र पाल

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को रत्नागिरी, महाराष्ट्र के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी।

वे भारत में अंग्रेजों के शासन को अभिशाप समझते थे तथा इसे उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी मार्ग को गलत नहीं मानते थे। इन विचारों के कारण पूना में हजारों युवक उनके सम्पर्क में आये। इनमें चाफेकर बन्धु प्रमुख थे। तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने पूना के कुख्यात प्लेग कमिश्नर रैण्ड का वध किया और तीनों भाई फाँसी चढ़ गये।

सन 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग, अकाल और भूकम्प का संकट एक साथ आ गया। लेकिन दुष्ट अंग्रेजों ने ऐसे में भी जबरन लगान की वसूली जारी रखी। इससे तिलक जी का मन उद्वेलित हो उठा। उन्होंने इसके विरुद्ध जनता को संगठित कर आन्दोलन छेड़ दिया। नाराज होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें 18 मास की सजा दी। तिलक जी ने जेल में अध्ययन का क्रम जारी रखा और बाहर आकर फिर से आन्दोलन में कूद गये।

तिलक जी एक अच्छे पत्रकार भी थे। उन्होंने अंग्रेजी में ‘मराठा’ तथा मराठी में ‘केसरी’ साप्ताहिक अखबार निकाला। इसमें प्रकाशित होने वाले विचारों से पूरे महाराष्ट्र और फिर देश भर में स्वतन्त्रता और स्वदेशी की ज्वाला भभक उठी।

युवक वर्ग तो तिलक जी का दीवाना बन गया। लोगों को हर सप्ताह केसरी की प्रतीक्षा रहती थी। अंग्रेज इसके स्पष्टवादी सम्पादकीय आलखों से तिलमिला उठे। बंग-भंग के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के पक्ष में तिलक जी ने खूब लेख छापे। जब खुदीराम बोस को फाँसी दी गयी, तो तिलक जी ने केसरी में उसे भावपूर्ण श्रद्धा॰जलि दी।

अंग्रेज तो उनसे चिढ़े ही हुए थे। उन्होंने तिलक जी को कैद कर छह साल के लिए बर्मा की माण्डले जेल में भेज दिया। वहाँ उन्होंने ‘गीता रहस्य’नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी।

तिलक जी समाज सुधारक भी थे। वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में वे सरकारी हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने जनजागृति के लिए महाराष्ट्र में गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव की परम्परा शुरू की, जो आज विराट रूप ले चुकी है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में उग्रवाद के प्रणेता तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह माँगने से नहीं मिलेगी। अतः उन्होंने नारा दिया – स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे।

वे वृद्ध होने पर भी स्वतन्त्रता के लिए भागदौड़ में लगे रहे। जेल की यातनाओं तथा मधुमेह से उनका शरीर जर्जर हो चुका था। मुम्बई में अचानक वे निमोनिया बुखार से पीड़ित हो गये। अच्छे से अच्छे इलाज के बाद भी वे सँभल नहीं सके और एक अगस्त, 1920 को मुम्बई में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली।

श्री लोकमान्य तिलक हम सभी भारतीयों को, आदरणीय और आदर्श मार्गदर्शक के रूप में आज भी प्रेरणा दे रहे हैं.

।  वंदे भारत मातरम् 

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महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद
गुजरात