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Friday, September 7, 2018

महर्षि अरविंद के नानाजी - श्री राजनारायण वसु


बंगाल के प्रतिभाशाली समाज सुधारक
राष्ट्रऋषि राजनारायण बसु

बंगाल की अनेक विभूतियों ने भारत देश और हिन्दू धर्म को सार्थक दिशा दी है। 7 सितम्बर, 1826 को बोड़ाल ग्राम में जन्मे राष्ट्रऋषि राजनारायण बसु भी उनमें से एक थे। इनके पूर्वज बल्लाल सेन के युग में गोविन्दपुर में बसे थे। कुछ समय बाद अंग्रेजों ने इसे फोर्ट विलियम में मिला लिया। अतः इनका परिवार पहले ग्राम सिमला और फिर बोड़ाल आ गया।

सात वर्ष की अवस्था में बसु ने शिक्षारम्भ कर अंग्रेजी, लेटिन, संस्कृत और बंगला का गहन अध्ययन किया। 1843 में ब्राह्मधर्म के अनुयायी बनकर ये महर्षि देवेन्द्रनाथ के संपर्क में आये। इनके आग्रह पर उन्होंने चार विद्वानों को काशी भेजकर वेदाध्यन की परम्परा को पुनर्जीवित किया था। 1847 में इन्होंने केन, कठ, मुण्डक तथा श्वेताश्वर उपनिषद का अंग्रेजी में अनुवाद किया।

शिक्षा पूर्णकर 1851 में इन्होंने अध्यापन कार्य को अपनाया। राजकीय विद्यालय में ये पहले भारतीय प्राचार्य बने। उन्होंने 1857 के स्वाधीनता संग्राम के उत्साह और उसकी विफलता को निकट से देखा। मेदिनीपुर में नियुक्ति के समय इन्हें प्रशासनिक सेवा में जाने का अवसर मिला; पर इन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

उस समय बंगाल के बुद्धिजीवियों में ब्राह्म समाज तेजी से फैल रहा था। यह हिन्दू धर्म का ही एक सुधारवादी रूप था; पर कुछ लोग इसे अलग मानते थे। हिन्दुओं को बांटने के इच्छुक अंग्रेज भी इन अलगाववादियों के पीछे थेे; पर श्री बसु ने अपने तर्कपूर्ण भाषण और लेखन द्वारा इस षड्यन्त्र को विफल कर दिया। उन्होंने अपनी बड़ी पुत्री स्वर्णलता का विवाह डा. कृष्णधन घोष से ब्राह्म पद्धति से ही किया। श्री अरविन्द इसी दम्पति के पुत्र थे।

देश, धर्म और राष्ट्रभाषा के उन्नायक श्री बसु ने अनेक संस्थाएं स्थापित कीं। 1857 के स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद उन्होंने‘महचूणोमुहाफ’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाया। नवयुवकों में चरित्र निर्माण हेतु इन्होंने ‘राष्ट्रीय गौरवेच्छा सम्पादिनी सभा’ की स्थापना की। इनकी प्रेरणा से ही ‘हिन्दू मेला’ प्रारम्भ हुआ। बंगाल में देवनागरी लिपि,हिन्दी और संस्कृत शिक्षण तथा गोरक्षा के लिए भी इन्होंने अनेक प्रयास किये। बंकिमचंद्र चटर्जी ने वन्दे मातरम् गीत 1875 में लिखा था। श्री बसु ने जब उसका अंग्रेजी अनुवाद किया, तो उसकी गूंज ब्रिटिश संसद तक हुई।

श्री बसु ने मुसलमान तथा ईसाइयों को वापस लाने के लिए ‘महाहिन्दू समिति’ बनाई। इसके कार्यक्रम ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’तथा ‘वन्दे मातरम्’ के गान से प्रारम्भ होते थे। यद्यपि शासन के कोप से बचने के लिए ‘गॉड सेव दि क्वीन’ भी बोला जाता था। इसके सदस्य एक जनवरी के स्थान पर प्रथम बैसाख को नववर्ष मनाते थे। वे ‘गुड नाइट’ के बदले ‘सु रजनी’ कहते थे तथा विदेशी शब्दों को मिलाये बिना शुद्ध भाषा बोलते थे। एक विदेशी शब्द के व्यवहार पर एक पैसे का अर्थदंड देना होता था। युवकों में शराब की बढ़ती लत को देखकर इन्होंने ‘सुरापान निवारिणी सभा’ भी बनाई।

‘हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता’ नामक तर्कपूर्ण भाषण में उन्होंने इसे वैज्ञानिक  और युगानुकूल सिद्ध किया। मैक्समूलर तथा जेम्स रटलेज जैसे विदेशी विद्वानों ने इसे कई बार उद्धृत किया है। इस विद्वत्ता के कारण उन्हें ‘हिन्दू कुल चूड़ामणि’ तथा ‘राष्ट्र पितामह’ जैसे विशेषणों से विभूषित किया गया। तत्कालीन सभी प्रमुख विचारकों से इनका सम्पर्क था। ऋषि दयानंद,स्वामी विवेकानंद, स्वामी अखंडानद, मालवीय जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर,माइकेल मधुसूदन दत्त तथा कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ.ह्यूम से भी इनकी भेंट होती रहती थी।

1868 में सेवानिवृत्त होकर ये 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक देवधर वैद्यनाथ धाम में बस गये। 18 दिसम्बर, 1899 को वहीं इनका देहांत हुआ।

भारतीय तत्वज्ञान, संस्कृति और सभ्यता का परिचय अंग्रेजों को देने वाले, संस्कृत तथा संस्कृति के परिचायक श्री राजनारायण वसु को हार्दिक श्रद्धांजलि.

Sunday, August 12, 2018

डॉ. विक्रम साराभाई,- अंतरिक्ष वैज्ञानिक

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महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक,
डा. विक्रम साराभाई

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जिस समय देश अंग्रेजों के चंगुल से स्वतन्त्र हुआ, तब भारत में विज्ञान सम्बन्धी शोध प्रायः नहीं होते थे। गुलामी के कारण लोगों के मानस में यह धारणा बनी हुई थी कि भारतीय लोग प्रतिभाशाली नहीं है। शोध करना या नयी खोज करना इंग्लैण्ड, अमरीका, रूस, जर्मनी, फ्रान्स आदि देशों का काम है। इसलिए मेधावी होने पर भी भारतीय वैज्ञानिक कुछ विशेष नहीं कर पा रहे थे।

पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश का वातावरण बदला। ऐसे में जिन वैज्ञानिकों ने अपने परिश्रम और खोज के बल पर विश्व में भारत का नाम ऊँचा किया, उनमें डा. विक्रम साराभाई का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने न केवल स्वयं गम्भीर शोध किये, बल्कि इस क्षेत्र में आने के लिए युवकों में उत्साह जगाया और नये लोगों को प्रोत्साहन दिया। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम ऐसे ही लोगों में से एक हैं।

डा. साराभाई का जन्म 12 अगस्त, 1919 को कर्णावती (अमदाबाद, गुजरात) में हुआ था। पिता श्री अम्बालाल और माता श्रीमती सरला बाई ने विक्रम को अच्छे संस्कार दिये। उनकी शिक्षा माण्टसेरी पद्धति के विद्यालय से प्रारम्भ हुई। इनकी गणित और विज्ञान में विशेष रुचि थी। वे नयी बात सीखने को सदा उत्सुक रहते थे।

श्री अम्बालाल का सम्बन्ध देश के अनेक प्रमुख लोगों से था। रवीन्द्र नाथ टैगोर,जवाहरलाल नेहरू, डा. चन्द्रशेखर वेंकटरामन और सरोजिनी नायडू जैसे लोग इनके घर पर ठहरते थे। इस कारण विक्रम की सोच बचपन से ही बहुत व्यापक हो गयी।

डा. साराभाई ने अपने माता-पिता की प्रेरणा से बालपन में ही यह निश्चय कर लिया कि उन्हें अपना जीवन विज्ञान के माध्यम से देश और मानवता की सेवा में लगाना है। स्नातक की शिक्षा के लिए वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये और 1939 में‘नेशनल साइन्स ऑफ ट्रिपोस’ की उपाधि ली।

द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने पर वे भारत लौट आये और बंगलौर में प्रख्यात वैज्ञानिक डा. चन्द्रशेखर वेंकटरामन के निर्देशन में प्रकाश सम्बन्धी शोध किया। इसकी चर्चा सब ओर होने पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.एस-सी. की उपाधि से सम्मानित किया। अब उनके शोध पत्र विश्वविख्यात शोध पत्रिकाओं में छपने लगे।

अब उन्होंने कर्णावती (अमदाबाद) के डाइकेनाल और त्रिवेन्द्रम स्थित अनुसन्धान केन्द्रों में काम किया। उनका विवाह प्रख्यात नृत्यांगना मृणालिनी देवी से हुआ। उनकी विशेष रुचि अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में थी। वे चाहते थे कि भारत भी अपने उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज सके। इसके लिए उन्होंने त्रिवेन्द्रम के पास थुम्बा और श्री हरिकोटा में राकेट प्रक्षेपण केन्द्र स्थापित किये।

डा. साराभाई भारत के ग्राम्य जीवन को विकसित देखना चाहते थे। ‘नेहरू विकास संस्थान’ के माध्यम से उन्होंने गुजरात की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह देश-विदेश की अनेक विज्ञान और शोध सम्बन्धी संस्थाओं के अध्यक्ष और सदस्य थे। अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने के बाद भी वे गुजरात विश्वविद्यालय में भौतिकी के शोध छात्रों को सदा सहयोग करते रहे।

डा. साराभाई 20 दिसम्बर, 1971 को अपने साथियों के साथ थुम्बा गये थे। वहाँ से एक राकेट का प्रक्षेपण होना था। दिन भर वहाँ की तैयारियाँ देखकर वे अपने होटल में लौट आये; पर उसी रात में अचानक उनका देहान्त हो गया।

भारत माताने अपना एक आंतराष्टीय ख्याति प्राप्त, अंतरिक्ष वैज्ञानिक, शांत और सुशील, दीर्घ द्रष्टि वाले, सपूत को खो दिया.  मगर उसने अपने पीछे, अपने ही समान मेधावी, महेनती और देशभक्त वैज्ञानिकों का एक समूह तैयार किया था. जो भारत को अंतरिक्ष विज्ञान तथा मिसाइल टेक्नोलॉजी में ओर आगे बढ़ने में समर्थ और सक्षम था.

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Friday, July 6, 2018

राष्ट्र सेवीका समिति की आद्य चालिका पू. मौसीजी

वन्दनीय मौसीजी   (लक्ष्मीबाई केलकर)

नारी जागरण की अग्रदूत

जन्म दिवस - 6 जुलाई

बंगाल विभाजन के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के दिनों में छह जुलाई, 1905को नागपुर में कमल नामक बालिका का जन्म हुआ। कमल के घर में देशभक्ति का वातावरण था। उसकी माँ जब लोकमान्य तिलक का अखबार ‘केसरी’ पढ़ती थीं, तो कमल भी गौर से उसे सुनती थी। केसरी के तेजस्वी विचारों से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि वह दहेज रहित विवाह करेगी। इस जिद के कारण उसका विवाह 14 वर्ष की अवस्था में वर्धा के एक विधुर वकील पुरुषोत्तमराव केलकर से हुआ,जो दो पुत्रियों के पिता थे। विवाह के बाद उसका नाम लक्ष्मीबाई हो गया।
अगले 12 वर्ष में लक्ष्मीबाई ने छह पुत्रों को जन्म दिया। वे एक आदर्श व जागरूक गृहिणी थीं। मायके से प्राप्त संस्कारों का उन्होंने गृहस्थ जीवन में पूर्णतः पालन किया। उनके घर में स्वदेशी वस्तुएँ ही आती थीं। अपनी कन्याओं के लिए वे घर पर एक शिक्षक बुलाती थीं। वहीं से उनके मन में कन्या शिक्षा की भावना जन्मी और उन्होंने एक बालिका विद्यालय खोल दिया।

रूढ़िग्रस्त समाज से टक्कर लेकर उन्होंने घर में हरिजन नौकर रखे। गांधी जी की प्रेरणा से उन्होंने घर में चरखा मँगाया। एक बार जब गांधी जी ने एक सभा में दान की अपील की, तो लक्ष्मीबाई ने अपनी सोने की जंजीर ही दान कर दी।

1932 में उनके पति का देहान्त हो गया। अब अपने बच्चों के साथ बाल विधवा ननद का दायित्व भी उन पर आ गया। लक्ष्मीबाई ने घर के दो कमरे किराये पर उठा दिये। इससे आर्थिक समस्या कुछ हल हुई। इन्हीं दिनों उनके बेटों ने संघ की शाखा पर जाना शुरू किया। उनके विचार और व्यवहार में आये परिवर्तन से लक्ष्मीबाई के मन में संघ के प्रति आकर्षण जगा और उन्होंने संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार से भेंट की।

डा. हेडगेवार ने उन्हें बताया कि संघ में स्त्रियाँ नहीं आतीं। तब उन्होंने1936 में स्त्रियों के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नामक एक नया संगठन प्रारम्भ किया। समिति के कार्यविस्तार के साथ ही लक्ष्मीबाई ने नारियों के हृदय में श्रद्धा का स्थान बना लिया। सब उन्हें ‘वन्दनीया मौसीजी’कहने लगे। आगामी दस साल के निरन्तर प्रवास से समिति के कार्य का अनेक प्रान्तों में विस्तार हुआ।

1945 में समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। देश की स्वतन्त्रता एवं विभाजन से एक दिन पूर्व वे कराची, सिन्ध में थीं। उन्होंने सेविकाओं से हर परिस्थिति का मुकाबला करने और अपनी पवित्रता बनाये रखने को कहा। उन्होंने हिन्दू परिवारों के सुरक्षित भारत पहुँचने के प्रबन्ध भी किये।

मौसीजी स्त्रियों के लिए जीजाबाई के मातृत्व, अहल्याबाई के कर्तृत्व तथा लक्ष्मीबाई के नेतृत्व को आदर्श मानती थीं। उन्होंने अपने जीवनकाल में बाल मन्दिर, भजन मण्डली, योगाभ्यास केन्द्र, बालिका छात्रावास आदि अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये। वे रामायण पर बहुत सुन्दर प्रवचन देतीं थीं। उनसे होने वाली आय से उन्होंने अनेक स्थानों पर समिति के कार्यालय बनवाये।

27 नवम्बर, 1978 को नारी जागरण की अग्रदूत वन्दनीय मौसीजी का देहान्त हुआ। उन द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति आज विश्व के 25 से भी अधिक देशों में सक्रिय है।

Friday, June 29, 2018

दक्षिण भारत में संघके आधारस्तंभ

दक्षिण भारत में संघके नीव के पथ्थर

*शिवराम पंत जोगलेकर*

पूण्य तिथि - 29 जून

बात 1943 की है। श्री गुरुजी ने युवा प्रचारक शिवराम जोगलेकर से पूछा - क्यों शिवराम, तुम्हें रोटी अच्छी लगती है या चावल ?

शिवराम जी ने कुछ संकोच से कहा - गुरुजी, मैं संघ का प्रचारक हूं। रोटी या चावल, जो मिल जाए, वह खा लेता हूं। श्री गुरुजी ने कहा - अच्छा, तो तुम चेन्नई चले जाओ, अब तुम्हें वहां संघ का काम करना है। इस प्रकार शिवराम जी संघ कार्य के लिए तमिलनाडु में आये, तो फिर अंतिम सांस भी उन्होंने वहीं ली।

शिवराम जी का जन्म 1917 में बागलकोट (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता श्री यशवंत जोगलेकर डाक विभाग में काम करते थे; पर जब शिवराम जी केवल एक वर्ष के थे, तब ही उनका देहांत हो गया। ऐसे में उनका पालन मां श्रीमती सरस्वती जोगलेकर ने अपनी ससुराल सांगली में बड़े कष्टपूर्वक किया।

छात्र जीवन में वे अपने अध्यापक श्री चिकोडीकर के राष्ट्रीय विचारों से बहुत प्रभावित हुए। उनके आग्रह पर शिवराम जी ने ‘वीर सावरकर’ के जीवन पर एक ओजस्वी भाषण दिया। युवावस्था में पूज्य मसूरकर महाराज की प्रेरणा से शिवराम जी ने जीवन भर देश की ही सेवा करने का व्रत ले लिया।

सांगली में पढ़ते समय 1932 में डा. हेडगेवार के दर्शन के साथ ही उनके जीवन में संघ-यात्रा प्रारम्भ हुई। 1936 में इंटर उत्तीर्ण कर वे पुणे आ गये। यहां उन्हें नगर कार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। 1938 में बी.एस-सी पूर्ण कर उन्होंने ‘वायु में धूलकणों की गति’ पर एक लघु शोध प्रबंध भी लिखा।

21 जून, 1940 को जब उन्हें डा. हेडगेवार के देहांत का समाचार मिला, वे पुणे में मौसम विभाग की प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। उन्होंने तत्काल प्रचारक बनने का निश्चय कर लिया; पर पुणे के संघचालक श्री विनायकराव आप्टे ने पहले उन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने का आग्रह किया। अतः शिवराम जी 1942 में स्वर्ण पदक के साथ एम.एस-सी उत्तीर्ण कर प्रचारक बने।

सर्वप्रथम उन्हें मुंबई भेजा गया और फिर 1943 में चेन्नई। तमिलनाडु संघ कार्य के लिए प्रारम्भ में बहुत कठिन क्षेत्र था। वहां के राजनेताओं ने जनता में यह भ्रम निर्माण किया था कि उत्तर भारत वालों ने सदा से हमें दबाकर रखा है। वहां हिन्दी के साथ ही हिन्दू का भी व्यापक विरोध होता था। ऐसे वातावरण में शिवराम जी ने सर्वप्रथम मजदूर वर्ग के बीच शाखाएं प्रारम्भ कीं। इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत संबंध बनाने पर अधिक जोर दिया।

उन दिनों संघ के पास पैसा तो था नहीं, अतः शिवराम जी पैदल घूमते हुए नगर की निर्धन बस्तियों तथा निकटवर्ती गांवों में सम्पर्क करते थे। वहां की पेयजल, शिक्षा, चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक सेवा केन्द्र प्रारम्भ किये। इससे उनके उठने-बैठने और भोजन-विश्राम के स्थान  क्रमशः बढ़ने लगे। इसमें से ही फिर कुछ शाखाएं भी प्रारम्भ हुईं। सेवा से हिन्दुत्व जागरण एवं शाखा प्रसार का यह प्रयोग अभिनव था।

शिवराम जी अपने साथ समाचार पत्र रखते थे तथा गांवों में लोगों को उसे पढ़कर सुनाते। वे शिक्षित लोगों को सम्पादक के नाम पत्र लिखने को प्रेरित करते थे। इसमें से ही आगे चलकर ‘विजिल’ नामक संस्था की स्थापना हुई। इस प्रकल्प से हजारों शिक्षित लोग संघ से जुड़े। आज तमिलनाडु में संघ कार्य का जो सुदृढ़ आधार है, उसके पीछे शिवराम जी की ही साधना है।

60 वर्ष तक तमिलनाडु में संघ के विविध दायित्व निभाते हुए 29 जून, 1999 को शिवराम जी का देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार मृत्योपरांत उनकी देह चिकित्सा कार्य के लिए दान कर दी गयी।

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संकलन
महेंद्रभाई  रावल
शब्द संवाद
गुजरात

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Monday, February 26, 2018

*भारतके मूलनिवासी और मालिक आर्य ही थे*

क्या आर्य विदेशी थे?

(तमिल नाडु के अभिनेता कमल हासन ने अपनी विघटनकारी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए बयान दिया हैं कि द्रविड़ संस्कृति के तले दक्षिण भारतीयों को एक हो जाना चाहिए। ये लोग सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक महान राष्ट्र बताने के स्थान पर केवल तोड़ने की बात करते हैं। आर्यों के विदेशी होने की कल्पना को अनेक बुद्धिजीवियों ने केवल एक अंग्रेजों की सोची समझी कल्पना बताया था। स्वामी दयानन्द ने आधुनिक भारत में सबसे पहले यह उद्घोष किया था कि आर्य विदेशी नहीं थे और किसी भी इतिहास अथवा धर्मशास्त्र मैंने ऐसा लीखा हैं। आधुनिक चिंतकों में डॉ अम्बेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे। विद्वान लेखक कार्तिक अय्यर का शोधपूर्वक लेख आर्यों को विदेशी कहने वालों के भ्रम को दूर करने वाला हैं।)
- डॉ विवेक आर्य)

मूलनिवासी अकसर आर्यों को विदेशी कहने पर तुले रहते हैं। परंतु वे कभी डॉ अंबेडकर जी को पढ़ते तक नहीं हैं। डॉ अंबेडकर ने माना है कि आर्य कोई विदेशी जाति नहीं,वरन् आर्य भारत के मूलनिवासी थे। हम कुछ प्रमाण रखते हैं जिससे सिद्ध होगा कि डॉ अंबेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे।

देखिये, पहला प्रमाण अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 7 पेज नं 321:-

" यह सोचना गलत है कि आर्य आक्रमणकारियों ने शूद्रों पर विजय प्राप्त की।पहली बात तो ये है कि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्य भारत के बाहर से आये और उन्होंने यहां के मूलनिवासियों पर आक्रमण किया था।इस बात की पुष्टि के कई प्रमाण है कि आर्य भारत के मूलनिवासी थे।"

फिर आगे पेज नं 322 पर लिखते हैं:-

"शूद्र को आर्य स्वीकार किया था और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी उनको आर्य कहा गया है।
शूद्र आर्यों के अभिन्न,जन्मजात और सम्मानित सदस्य थे।"
लीजिये। अब शूद्रों को भी आर्य कह दिया!

दूसरा प्रमाण है "शूद्र कौन थे" पेज नंबर 52 पुस्तक से।

"जहां तक आर्य जाति के बाहर से आने और यहां के मूलनिवासियों को जीतने का संबंध है,ऋग्वेद में ऐसा कोई भी प्रसंग नहीं है जो इसकी पुष्टि करता हो।वैदिक साहित्य इस मत के विपरीत है कि आर्य विदेश से आये।"

"ऋग्वेद में आर्य तथा दास और दस्युओं के युद्ध के विषय में कोई विशेष कथा नहीं मिलती।"

एक अंतिम प्रमाण "शूद्रों की खोज" पुस्तक से देते हैं ।

१:- शूद्र आर्यजाति के सूर्यवंशी थे।
२:- भारतीय आर्यों में शूद्र क्षत्रिय वर्ण के थे।
३:-....... शूद्र क्षत्रिय वर्ण के थे।
इत्यादि ।

परिणाम:-अंबेडकर के अनुसार:-

१:- आर्य विदेशी नहीं थे न उन्होंने भारत के             मूलनिवासियों पर आक्रमण किया।
२:- आर्य भारत के मूलनिवासी हैं,उनके भारतीय        होने के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं।
३:- शूद्र भी आर्य जाति के अभिन्न अंग थे।
वे क्षत्रिय वर्ण के ही थे।
       
हमने डॉ अंबेडकर साहब की पुस्तकों से सिद्ध कर दिया के वे न तो आर्यों को विदेशी मानते थे,
और न ही आक्रमण कारी मानते थे।

डॉ अम्बेडकर को अपना मार्गदर्शक बताने वाले अम्बेडकरवादी उनकी इस मान्यता को जानकर नहीं मानते। क्यूंकि इससे उनका षड़यंत्र असफल हो जायेगा। ये लोग अपने दादागुरु की पुस्तकें पढ़े बिना उनके विपरीत ही झूठी कल्पना करते रहते हैं।
आर्यों को विदेशी कहना डॉ अंबेडकर के अपमान समान है।

इसलिये मूलनिवासियों को कोई हक नहीं है कि आर्यों को विदेशी बतावें।

संदर्भग्रंथ एवं पुस्तकें:-

१:- अंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खंड 7
२:- शूद्र कौन थे
३:- शूद्रों की खोज
-- सबके लेखक डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर हैं।

महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद