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Saturday, July 14, 2018

Dr. Rajendra Singh ji. Rajju Bhiya

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह
(रज्जू भैया)
पूण्य तिथि -14 जुलाई

🌹

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह का जन्म
29 जनवरी, 1922 को
ग्राम बनैल (जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश)
के एक सम्पन्न एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता कुँवर बलबीर सिंह अंग्रेज शासन में पहली बार बने भारतीय मुख्य अभियन्ता थे। इससे पूर्व इस पद पर सदा अंग्रेज ही नियुक्त होते थे। राजेन्द्र सिंह को घर में सब प्यार से रज्जू कहते थे। आगे चलकर उनका यही नाम सर्वत्र लोकप्रिय हुआ।

रज्जू भैया बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उनके पिता की इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जायें। इसीलिए उन्हें पढ़ने के लिए प्रयाग भेजा गया; पर रज्जू भैया को अंग्रेजों की गुलामी पसन्द नहीं थी। उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम-एस.सी. उत्तीर्ण की और फिर वहीं भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गये।

उनकी एम-एस.सी. की प्रयोगात्मक परीक्षा लेने नोबेल पुरस्कार विजेता डा. सी.वी.रमन आये थे। वे उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने साथ बंगलौर चलकर शोध करने का आग्रह किया; पर रज्जू भैया के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही था।

प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र, जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ, उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे।

प्राध्यापक रहते हुए रज्जू भैया अब संघ कार्य के लिए अब पूरे उ.प्र.में प्रवास करने लगे। वे अपनी कक्षाओं का तालमेल ऐसे करते थे, जिससे छात्रों का अहित न हो तथा उन्हें सप्ताह में दो-तीन दिन प्रवास के लिए मिल जायें। पढ़ाने की रोचक शैली के कारण छात्र उनकी कक्षा के लिए उत्सुक रहते थे।

रज्जू भैया सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे। वे सदा तृतीय श्रेणी में ही प्रवास करते थे तथा प्रवास का सारा व्यय अपनी जेब से करते थे। इसके बावजूद जो पैसा बचता था, उसे वे चुपचाप निर्धन छात्रों की फीस तथा पुस्तकों पर व्यय कर देते थे। 1966 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय संघ को ही देने लगे।

अब उन पर उत्तर प्रदेश के साथ बिहार का काम भी आ गया। वे एक अच्छे गायक भी थे। संघ शिक्षा वर्ग की गीत कक्षाओं में आकर गीत सीखने और सिखाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। सरल उदाहरणों से परिपूर्ण उनके बौद्धिक ऐसे होते थे, मानो कोई अध्यापक कक्षा ले रहा हो।

उनकी योग्यता के कारण उनका कार्यक्षेत्र क्रमशः बढ़ता गया। आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ।

1977 में रज्जू भैया सह सरकार्यवाह,
1978 में सरकार्यवाह और
1994 में सरसंघचालक बने।

उन्होंने देश भर में प्रवास कर स्वयंसेवकों को कार्य विस्तार की प्रेरणा दी। बीमारी के कारण उन्होंने 2000 ई0 में श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दे दिया। इसके बाद भी वे सभी कार्यक्रमों में जाते रहे।

अन्तिम समय तक सक्रिय रहते हुए 14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में रज्जू भैया का देहान्त हो गया।

महेंद्रभाई रावल
संयोजक
शब्द संवाद

Tuesday, February 27, 2018

મૃત્યુનો બોધપાઠ


🌹✋🌹

*મૃત્યુનો બોધપાઠ*

ગઈ કાલ ના છાપાં ની હેડલાઈન હતી
*રૂપકી રાની ની જુદાઈ થી સદમા*

આજના છાપાં ની હેડલાઈન
*નશામાં ધૂત શ્રીદેવીનું ટબ માં ડૂબી અપમૃત્યુ*

કહેવાય છે,
*You are as Good as Your Last Act or Omission*

ચોવીસ કલાકમાં, હેડલાઈન જ નહીં, એમાંની લાગણીઓ, ભાવના અને મૃતક પ્રત્યેનો આદર, બધું જ બદલાઈ ગયું. આ વાત ફક્ત મીડિયાની નથી. આ વાત છે આખા જગતની, દરેક માણસની, જેણે દુનિયાદારીનું ગ્રાઈપ વોટર ગટગટાવી લીધું છે

ચોવીસ કલાકથી ઓછા સમયમાં, આ રંગ બદલતી દુનિયાએ પોતાનો રંગ બદલી દીધો. વારે તહેવારે, છાસવારે, દુનિયા આપણને આ બોધ આપતી રહે છે, પણ આપણે આ બોધ લેવા કે સ્વીકારવા નથી માંગતા

કાલ સાજ સુધી એની ક્લિપ્સ, મુવી કટિંગ, સંવાદો અને યાદો વાગોળતા વોટ્સ એપિયા ફેન્સ, રાત થી એના પોસ્ટ મોર્ટમ રિપોર્ટ નું પોસ્ટ મોર્ટમ કરવા માંડ્યા

*પરંતુ જ્યારે બહાર આવ્યું છે દારૂના નશામાં ધૂત હતી - તે પછી લોકોના દિલમાંથી ઉતરી ગઈ*.. સ્ત્રી પણ આટલો બધો દારૂ પીએ...!

ફરી એકવાર આ દુનિયા આપણને તદ્દન મફતમાં આ બોધ આપી રહી છે કે
*What you believe Matters,*
*Really doesn't Matter*

રૂપ, પૈસો, તાકત, શક્તિ, નામના, બધુ જ ક્ષણિક છે. બધું જ ભ્રમ છે, બધું જ ક્ષણ ભંગુર છે. *સાચી મૂડી, આપણે કરેલા કર્મો છે, આપણે કમાવેલા સંબધો છે, આપણે વાવેલાં ઋણાનુબંધ છે.*
સાચી કમાઈ, તમારાં પોતીકાઓ છે, એમને આપેલો પ્રેમ છે, એમણે પાછો વરસાવેલો સ્નેહ છે

શક્ય હોય તો આ ચોવીસ કલાકમાં બદલાયેલી હેડલાઈનથી જિંદગીએ શીખવેલો આ પાઠ યાદ રાખવાનો યત્ન કરીએ

*મહેન્દ્રભાઈ રાવલ*
સંપાદક
*શબ્દ  સંવાદ*

Monday, February 26, 2018

*भारतके मूलनिवासी और मालिक आर्य ही थे*

क्या आर्य विदेशी थे?

(तमिल नाडु के अभिनेता कमल हासन ने अपनी विघटनकारी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए बयान दिया हैं कि द्रविड़ संस्कृति के तले दक्षिण भारतीयों को एक हो जाना चाहिए। ये लोग सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक महान राष्ट्र बताने के स्थान पर केवल तोड़ने की बात करते हैं। आर्यों के विदेशी होने की कल्पना को अनेक बुद्धिजीवियों ने केवल एक अंग्रेजों की सोची समझी कल्पना बताया था। स्वामी दयानन्द ने आधुनिक भारत में सबसे पहले यह उद्घोष किया था कि आर्य विदेशी नहीं थे और किसी भी इतिहास अथवा धर्मशास्त्र मैंने ऐसा लीखा हैं। आधुनिक चिंतकों में डॉ अम्बेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे। विद्वान लेखक कार्तिक अय्यर का शोधपूर्वक लेख आर्यों को विदेशी कहने वालों के भ्रम को दूर करने वाला हैं।)
- डॉ विवेक आर्य)

मूलनिवासी अकसर आर्यों को विदेशी कहने पर तुले रहते हैं। परंतु वे कभी डॉ अंबेडकर जी को पढ़ते तक नहीं हैं। डॉ अंबेडकर ने माना है कि आर्य कोई विदेशी जाति नहीं,वरन् आर्य भारत के मूलनिवासी थे। हम कुछ प्रमाण रखते हैं जिससे सिद्ध होगा कि डॉ अंबेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे।

देखिये, पहला प्रमाण अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 7 पेज नं 321:-

" यह सोचना गलत है कि आर्य आक्रमणकारियों ने शूद्रों पर विजय प्राप्त की।पहली बात तो ये है कि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्य भारत के बाहर से आये और उन्होंने यहां के मूलनिवासियों पर आक्रमण किया था।इस बात की पुष्टि के कई प्रमाण है कि आर्य भारत के मूलनिवासी थे।"

फिर आगे पेज नं 322 पर लिखते हैं:-

"शूद्र को आर्य स्वीकार किया था और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी उनको आर्य कहा गया है।
शूद्र आर्यों के अभिन्न,जन्मजात और सम्मानित सदस्य थे।"
लीजिये। अब शूद्रों को भी आर्य कह दिया!

दूसरा प्रमाण है "शूद्र कौन थे" पेज नंबर 52 पुस्तक से।

"जहां तक आर्य जाति के बाहर से आने और यहां के मूलनिवासियों को जीतने का संबंध है,ऋग्वेद में ऐसा कोई भी प्रसंग नहीं है जो इसकी पुष्टि करता हो।वैदिक साहित्य इस मत के विपरीत है कि आर्य विदेश से आये।"

"ऋग्वेद में आर्य तथा दास और दस्युओं के युद्ध के विषय में कोई विशेष कथा नहीं मिलती।"

एक अंतिम प्रमाण "शूद्रों की खोज" पुस्तक से देते हैं ।

१:- शूद्र आर्यजाति के सूर्यवंशी थे।
२:- भारतीय आर्यों में शूद्र क्षत्रिय वर्ण के थे।
३:-....... शूद्र क्षत्रिय वर्ण के थे।
इत्यादि ।

परिणाम:-अंबेडकर के अनुसार:-

१:- आर्य विदेशी नहीं थे न उन्होंने भारत के             मूलनिवासियों पर आक्रमण किया।
२:- आर्य भारत के मूलनिवासी हैं,उनके भारतीय        होने के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं।
३:- शूद्र भी आर्य जाति के अभिन्न अंग थे।
वे क्षत्रिय वर्ण के ही थे।
       
हमने डॉ अंबेडकर साहब की पुस्तकों से सिद्ध कर दिया के वे न तो आर्यों को विदेशी मानते थे,
और न ही आक्रमण कारी मानते थे।

डॉ अम्बेडकर को अपना मार्गदर्शक बताने वाले अम्बेडकरवादी उनकी इस मान्यता को जानकर नहीं मानते। क्यूंकि इससे उनका षड़यंत्र असफल हो जायेगा। ये लोग अपने दादागुरु की पुस्तकें पढ़े बिना उनके विपरीत ही झूठी कल्पना करते रहते हैं।
आर्यों को विदेशी कहना डॉ अंबेडकर के अपमान समान है।

इसलिये मूलनिवासियों को कोई हक नहीं है कि आर्यों को विदेशी बतावें।

संदर्भग्रंथ एवं पुस्तकें:-

१:- अंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खंड 7
२:- शूद्र कौन थे
३:- शूद्रों की खोज
-- सबके लेखक डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर हैं।

महेंद्रभाई रावल
संपादक
शब्द संवाद