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*भगवद् गीता में ध्यान योग*
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित:।
एकाकी यत चित्तात्मा निराशीरपरिग्रह:।।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन:।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।
तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय:।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।
प्रशांतत्मा विगतभिर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन: संयम्य मच्चितो युक्त आसीत् मत्पर:।।
युञ्जन्नेवं सदात्मनं योगी नियतमानस:।
शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।
--श्रीमद्भगवतगीता,,
अध्याय 6 श्लोक, 8-15
शरीर को वश मेंरखने वाला,आशारहित और संग्रहरहितयोगी
अकेला ही एकांत स्थान में स्थित
हो कर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में
लगावे।
शुद्ध भूमि में,जिसके ऊपर क्रमश: कुशा,
मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं,जो ना बहुत
ऊँचा है और ना बहुत नीचा,ऐसे अपने
आसन को स्थिर स्थापन करके_____
उस आसन पर बैठ कर चित्त और इन्द्रियों
की क्रियाओं को वश में रखते हुए,मन को
एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए
योग का अभ्यास करे।
काया,सिर और गले को सामान एवं अचल
धारण करके,स्थिर होकर,अपनी नासिका के
अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर,अन्य दिशाओं
को ना देखता हुआ____
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित,भयरहित तथा भली
भांति शांत अन्तः करण वाला सावधान योगी
मन को रोक कर मुझमे चित्त वाला और मेरे
परायण होकर स्थित होवे।
वश में किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार
आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वर के रूप
में लगाता हुआ मुझमे रहनेवाली परमानन्द
की पराकाष्ठा रूप शांति को प्राप्त होता है।
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जयति पुण्य सनातन संस्कृति
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