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शनि देव बहुत ही दयालु एवं न्याय प्रिय देवता
हैं,दुष्कर्मो की वे कठोर सजा देते है अतः उन्हें
क्रूर माना जाता है,जब कि ऐसा नहीं है,
लोग उनकी अढैया साढ़े साती अदि के प्रकोप
से भय भीत रहते हैं,उससे बचने का सुगम उपाय;-
१)माता पिता की सेवा करना।
२)गऊ माता की सेवा करना,सरंक्षण करना।
३)गरीबों की सेवा करना,सहायता करना।
इन विधियों से शनि देव कभी कुपित नहीं
होते,सदा प्रसन्न रहते हैं।
जिनके माता पिता नहीं हैं,
वे जगत माता पिता की सेवा करें।
कलियुग के व्यस्त शनिदेव !!
शनिदेव ईश्वरीय न्यायालय के परम निष्ठ एवं
गुणी न्यायाधीश है।
कलियुग में अधिकांश व्यक्ति अपनी स्वार्थ
सिद्धि के लिए धर्म विरुद्ध आचरण में लिप्त है
और फिर शनि के कठोर दंड से पीड़ित होना
भी उनकी नीयति है।
इतिहास-पुराणों में शनि की महिमा बिखरी पड़ी है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि गणेशजी का
जन्म होने पर सभी ग्रह उनका दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुँचे, उनके साथ शनि महाराज भी शामिल थे.
ज्योतिष में शनि को ठण्डा ग्रह माना गया है,
जो बीमारी,शोक और आलस्य का कारक है।
लेकिन यदि शनि शुभ हो तो वह कर्म की दशा
को लाभ की ओर मोड़ने वाला और ध्यान व
मोक्ष प्रदान करने वाला है। साथ ही वह कैरियर
को ऊँचाईयों पर ले जाता है।
लोगों में शनि को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ हैं।
बहुत-से लोगों का मानना है कि शनि देव का
काम सिर्फ़ परेशानियाँ देना और लोगों के कामों
में विघ्न पैदा करना ही है।
लेकिन शास्त्रों के अनुसार शनि देव परीक्षा लेने
के लिए एक तरफ़ जहाँ बाधाएँ खड़ी करते हैं,
वहीं दूसरी ओर प्रसन्न होने पर वे सबसे बड़े
हितैशी भी साबित होते हैं।
सूर्य पुत्र शनि देव का नाम सुनकर लोग सहम से
जाते है लेकिन हिसा कुछ नहीं है,
बेशक शनि देव की गिनती अशुभ ग्रहों में होती है
लेकिन शनि देव मनुष्य के कर्मो के अनुसार ही
फल देते है,शनि बुर कर्मो का दंड भी देते है।
शनिदेव का पुराणोक्त मंत्र :-
नीलांजनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
शनिदेव का वेदोक्त मंत्र :-
ऊँ शन्नो देवी रभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शन्नो रभि श्रवन्तु नः।
ऊँ शं शनैश्चराय नमः।
शनि की महिमा ही कुछ ऐसी है कि उनका
इंसान की कर्मकुंडली पर भारी होना इंसान
को डरा देता है।
शनि देव की यही छवि देवताओं में उन्हें
ख़ास स्थान दिलाती है।
शास्त्रों में शनि को सूर्य का पुत्र और मृत्यु के
देवता यम का भाई बताया गया है।
शनि की विशेषताओं का बखान करते हुए प्राचीनग्रंथ “श्री शनि महात्म्य” में लिखा गया है कि...
शनि देव का रंग काला है और उनका रूप सुन्दर है,
उनकी जाति तैली है और वे काल-भैरव की
उपासना करते हैं।
ज्योतिष में साढ़ेसाती और ढैया आदि दोषों का
कारण शनि को माना गया है।
जब वर्तमान समय में शनि किसी की चंद्र राशि
में,उससे एक राशि पहले या बाद में स्थित हो तो
उसे साढ़ेसाती कहते हैं।
कहते हैं कि साढ़ेसाती के दौरान भाग्य अस्त हो
जाता है।
लेकिन शनि को सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाला
ग्रह माना जाता है।
यदि शनि की नियमित आराधना की जाए
और तिल, तैल व काली चीज़ों का दान किया
जाए,तो शनि देव की अनुकम्पा पाने में ज़्यादा
वक़्त नहीं लगता।
शास्त्रों के मतानुसार हनुमानजी भक्तों को
शनि के सभी कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं।
रामायण के एक आख्यान के मुताबिक़ हनुमानजी ने, शनि को, रावण की क़ैद से छुड़ाया था और शनि देव ने उन्हें वचन दिया था कि...
जो भी हनुमानजीकी उपासना करेगा,शनि देव सभी मुश्किलों से उसकी रक्षा करेंगे।
शनि की उत्पत्ति का पौराणिक वृत्तांत——
महर्षि कश्यप का विवाह प्रजापति दक्ष की
कन्या अदिति से हुआ जिसके गर्भ से विवस्वान
(सूर्य )का जन्म हुआ।
सूर्य का विवाह त्वष्टा की पुत्री संज्ञा से हुआ।
सूर्य व संज्ञा के संयोग से वैवस्वत मनु व यम
दो पुत्र तथा यमुना नाम की कन्या का जन्म हुआ।
संज्ञा अपने पति के अमित तेज से संतप्त रहती थी।
सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन न कर
पाने पर उसने अपनी छाया को अपने ही समान
बना कर सूर्य के पास छोड़ दिया और स्वयम
पिता के घर आ गयी।
पिता त्वष्टा को यह व्यवहार उचित नहीं लगा
और उन्हों ने संज्ञा को पुनः सूर्य के पास जाने
का आदेश दिया।
संज्ञा ने पिता के आदेश की अवहेलना की और
घोड़ी का रूप बना कर कुरु प्रदेश के वनों में जा
कर रहने लगी।
इधर सूर्य संज्ञा की छाया को ही संज्ञा समझते रहे|
कालान्तर में संज्ञा के गर्भ से भी सावर्णि मनु और
शनि दो पुत्रों का जन्म हुआ।
छाया शनि से बहुत स्नेह करती थी और संज्ञा
पुत्र वैवस्वत मनु व यम से कम।
एक बार बालक यम ने खेल खेल में छाया को
अपना चरण दिखाया तो उसे क्रोध आ गया और
उसने यम को चरण हीन होने का शाप दे दिया।
बालक यम ने डर कर पिता को इस विषय में
बताया तो उन्हों ने शाप का परिहार बता दिया
और छाया संज्ञा से बालकों के बीच भेद भाव पूर्ण व्यवहार करने का कारण पूछा।
सूर्य के भय से छाया संज्ञा ने सम्पूर्ण सत्य
प्रगट कर दिया।
संज्ञा के इस व्यवहार से क्रोधित हो कर सूर्य
अपनी ससुराल में गए।
ससुर त्वष्टा ने समझा बुझा कर अपने दामाद
को शांत किया और कहा –
“ आदित्य ! आपका तेज सहन न कर सकने के
कारण ही संज्ञा ने यह अपराध किया है और घोड़ी के रूप में वन में भ्रमण कर रही है।
आप उसके इस अपराध को क्षमा करें और
मुझे अनुमति दें की मैं आपके तेज को काट
छांट कर सहनीय व मनोहर बना दूँ।"
अनुमति मिलने पर त्वष्टा ने सूर्य के तेज को
काट छांट दिया और विश्वकर्मा ने उस छीलन
से भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का निर्माण
किया।
मनोहर रूप हो जाने पर सूर्य संज्ञा को ले
कर अपने स्थान पर आ गए।
बाद में संज्ञा ने नासत्य और दस्र नामक
अश्वनी कुमारों को जन्म दिया।
यम की घोर तपस्या से प्रसन्न हो कर
महादेव ने उन्हें पितरों का आधिपत्य दिया
और धर्म अधर्म के निर्णय करने का अधिकारी
बनाया।
तथा यमराज की बहन यमुना व ताप्ती नदी के रूप में प्रवाहित हुई।
शनि को नव ग्रह मंडल में स्थान दिया गया।
शनिदेव को ग्रहत्व की प्राप्ति——
स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत है कि
छाया सुत "शनिदेव" ने अपने पिता भगवान
सूर्य से प्रार्थना की कि मै ऐसा पद प्राप्त
करना चाहता हूँ जिसे आज तक किसी ने
प्राप्त न किया हो, आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो और मेरे वेग का कोई सामना नही करपाये चाहे वह देव,असुर,दानव, ही क्यों न हो।
शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य
प्रसन्न हुए और उत्तर दिया कि इसके लिये
उसे काशी जा कर भगवान शंकर कि आराधना
करनी चाहिए।
शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही
किया और शिव ने प्रसन्न हो कर शनि को
ग्रहत्व प्रदान कर नव ग्रह मंडल में स्थान दिया।
शनि की क्रूर दृष्टि का रहस्य—–
ब्रह्म पुराण के अनुसार शनि देव बाल्य
अवस्था से ही भगवान विष्णु के परम
भक्त थे। हर समय उन के ही ध्यान में मग्न रहते थे।
विवाह योग्य आयु होने पर इनका विवाह
चित्ररथ की कन्या से संपन्न हुआ।
इनकी पत्नी भी साध्वी एवम तेजस्विनी थी।
एक बार वह पुत्र प्राप्ति की कामना से
शनिदेव के निकट आई।
उस समय शनि ध्यान मग्न थे अतः उन्हों
ने अपनी पत्नी की ओर दृष्टिपात तक नहीं
किया।
लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जब शनि का ध्यान
भंग नहीं हुआ तो वह ऋतुकाल निष्फल हो
जाने के कारण से क्रोधित हो गयी और शनि
को शाप दे दिया कि –
अब से तुम जिस पर भी दृष्टिपात करोगे
वह नष्ट हो जाएगा। तभी से शनि कि दृष्टि को क्रूर व अशुभ समझा जाता है
फलित ज्योतिष में भी शनि कि दृष्टि को
अमंगलकारी कहा गया है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी शनि कि क्रूर दृष्टि का
वर्णन है।
गौरी नंदन गणेश के जन्मोत्सव पर शनि
बालक के दर्शन कि अभिलाषा से गए।
मस्तक झुका कर बंद नेत्रों से माता पार्वती के
चरणों में प्रणाम किया,शिशु गणेश माता की
गोद में ही थे।
माँ पार्वती ने शनि को आशीष देते हुए प्रश्न किया,
” हे शनि देव ! आप गणेश को देख नहीं रहे हो
इसका क्या कारण है।”
शनि ने उत्तर दिया –“ माता ! मेरी सहधर्मिणी
का शाप है कि मैं जिसे भी देखूंगा उसका अनिष्ट
होगा,इसलिए मैं अपनी दृष्टि नीचे ही रखता हूँ।“
पार्वती ने सत्य को जान कर भी दैववश शनि को
बालककी ओर देखने का आदेश दिया।
धर्म को साक्षी मान कर शनि ने वाम नेत्र के
कोने से बालक गणेश पर दृष्टिपात किया।
दृष्टिपात के प्रकोप के कारण ही शिव जी ने प्रभु
श्री गणेश का मस्तक धड से अलग कर दिया था।
बाद में श्री हरि ने एक गज शिशु का मस्तक
गणेश के धड से जोड़ा और उस में प्राणों का
संचार किया।
तभी से गणेश गजानन नाम से प्रसिद्ध हुए।
मत्स्य पुराण के अनुसार शनि कि कान्ति
इन्द्रनील मणि के समान है।
शनि गिध्द पर सवार हाथ में धनुष बाण,
त्रिशूल व व्र मुद्रा से युक्त हैं।
ज्योतिष शास्त्र में शनि का स्वरूप
एवम प्रकृति——
प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि दुष्ट,
क्रोधी,आलसी,लंगड़ा ,काले वर्ण का,विकराल,
दीर्घ व कृशकाय शरीर का है। नेत्र पीले व गढ्ढे दार हैं। शरीर के अंग व रोम कठोर तथा नख व दांत मोटे हैं। शनि वात प्रकृति का तमोगुणी ग्रह है।
शनि का रथ एवम गति —–
शनि का रथ लोहे का है।
वाहन गिद्ध है।
सामान्यतः यह एक राशि में 30 मास तक
भ्रमणशील रहता है तथा सम्पूर्ण राशि चक्र
को लगभग 30 वर्ष में पूर्ण करता है।
इस मंद गति के कारण ही इसका नाम
शनैश्चर (शनै:चर) व मंद प्रसिद्ध है।
पद्म पुराण के अनुसार शनि जातक कि जन्म
राशि से पहले,दूसरे,बारहवें,चौथे व आठवें स्थान
पर आने पर कष्ट देता है।
शनि गृह वैज्ञानिक परिचय—–
शनि सौरमंडल का एक सदस्य ग्रह है।
यह सूरज से छटे स्थान पर है और सौरमंडल
में बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह हैं।
इसके कक्षीय परिभ्रमण का पथ
१४,२९,४०,००० किलोमीटर है।
शनि के ६० उपग्रह हैं।
जिसमें टाइटन सबसे बड़ा है।
शनि ग्रह की खोज प्राचीन
काल में ही हो गई थी।
शनि ग्रह की रचना ७५% हाइड्रोजन और
२५% हीलियम से हुई है।
जल, मिथेन,अमोनिया और पत्थर यहाँ बहुत
कम मात्रा में पाए जाते हैं।
नवग्रहों के कक्ष क्रम में शनि सूर्य से सर्वाधिक
दूरी पर अट्ठासी करोड,इकसठ लाख मील दूर है,
पृथ्वी से शनि की दूरी इकहत्तर करोड, इकत्तीस
लाख,तियालीस हजार मील दूर है।
शनि का व्यास पचत्तर हजार एक सौ मील है,
यह छ: मील प्रति सेकेण्ड की गति से २१.५ वर्ष
में अपनी कक्ष मे सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है।
शनि धरातल का तापमान २४० फ़ोरनहाइट है।
शनि के चारो ओर सात वलय हैं।
ज्योतिष शास्त्र में शनि को पाप व अशुभ ग्रह
माना गया है।
ग्रह मंडलमें शनि को सेवक का पद प्राप्त है।
यह मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी है।
यह तुला राशि में उच्च का तथा मेष राशि में
नीच का माना जाता है।
कुम्भ इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है।
शनि अपने स्थान से तीसरे,सातवें,दसवें
स्थानको पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी
दृष्टि को अशुभकारक कहा गया है।
जनमकुंडली में शनि षष्ट,अष्टम भाव का
कारक होता है।
शनि की सूर्य -चन्द्र –मंगल से शत्रुता,
शुक्र – बुध से मैत्री और गुरु से समता है।
यह स्व ,मूलत्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में,
शनिवार में,दक्षिणायनमें,दिन के अंत में,कृष्ण पक्ष
में,वक्री होने पर,वर्गोत्तम नवमांश में बलवान व
शुभकारक होता है।
शनि का शाकटभेद योग—–
पद्म पुराण के अनुसार पूर्वकाल में जब शनि
गोचर वश कृतिका नक्षत्र के अंतिम अंशों में
पहुंचे तो विद्वान दैवज्ञों ने रघुकुल भूषण राजा
दशरथ को सावधान किया कि शनि रोहिणी का
भेदन करके आगे बढ़ने वाले हैं जिस से शाकट
भेद योग बनेगा।
इस योग के कारण 12 वर्ष तक संसार में
भयंकर अकाल रहेगा।
राजा दशरथ ने यह सुन कर अपने संहारास्त्र का
संधान किया और नक्षत्र मंडल में शनि के समक्ष
पहुँच गए।
——-दशरथ कृत शनि स्तोत्र—–
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च।
नमः कालाग्नि रूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।
नमो निर्मोसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालद्रंष्ट नमोस्तुते।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरिक्ष्याय वै नमः।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने।।
नमस्ते सर्व भक्षाय बलि मुख नमोस्तुते।
सूर्य पुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च।।
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोस्तुते।
नमो मंद गते तुभ्यम निंस्त्रिशाय नमोस्तुते।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यम योगरताय च।
नमो नित्यम क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः।।
ज्ञानचक्षुर्नमस्ते ऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यम रुष्टो हरसि तत्क्षणात।।
देवासुर मनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा।
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरु में देव वराहोरऽहमुपागतः।।
शनि राजा दशरथ के साहस व पौरुष से
प्रसन्न हुए तथा उन्हें वर मांगने को कहा।
दशरथ ने कहा कि आप लोक हित में रोहिणी
में गोचर भ्रमण के समय कभी भी दीर्घ अवधि
का दुर्भिक्ष न करें।
शनि ने दशरथ कि प्रार्थना स्वीकार कि और
कभी भी लंबी अवधि का दुर्भिक्ष न करने का
वचन दिया।
शनि देव की आराधना-------
भगवान शनिदेव की पूजा करते समय
इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें चन्दन लेपना
चाहिए-
भो शनिदेवः चन्दनं दिव्यं गन्धादय सुमनोहरम्।
विलेपन छायात्मजः चन्दनं प्रति गृहयन्ताम्।।
भगवान शनिदेव की पूजा में इस मंत्र का जाप
करते हुए उन्हें अर्घ्य समर्पण करना चाहिए-
ॐ शनिदेव नमस्तेस्तु गृहाण करूणा कर।
अर्घ्यं च फ़लं सन्युक्तं गन्धमाल्याक्षतै युतम्।।
इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान श्री शनिदेव को
प्रज्वलीत दीप समर्पण करना चाहिए-
साज्यं च वर्तिसन्युक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेशं त्रेलोक्य तिमिरा पहम्.
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।।
इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान शनिदेव को
यज्ञोपवित समर्पण करना चाहिए और
उनके मस्तक पर काला चन्दन (काजल
अथवा यज्ञ भस्म) लगाना चाहिए-
परमेश्वरः नर्वाभस्तन्तु भिर्युक्तं
त्रिगुनं देवता मयम्।
उप वीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः।।
इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान श्री शनिदेव
को पुष्पमाला समर्पण करना चाहिए-
नील कमल सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो।
मयाहृतानि पुष्पाणि गृहयन्तां पूजनाय भो।।
भगवान शनि देव की पूजा करते समय इस
मंत्र का जाप करते हुए उन्हें वस्त्र समर्पण
करना चाहिए-
शनिदेवः शीतवातोष्ण संत्राणं लज्जायां रक्षणं परम्।
देवलंकारणम् वस्त्र भत: शान्ति प्रयच्छ मे।।
शनि देव की पूजा करते समय इस मंत्र को पढ़ते
हुए उन्हें सरसों के तेल से स्नान कराना चाहिए-
भो शनिदेवः सरसों तैल वासित स्निगधता।
हेतु तुभ्यं-प्रतिगृहयन्ताम्।।
सूर्यदेव पुत्र भगवान श्री शनिदेव की पूजा करते
समय इस मंत्र का जाप करते हुए पाद्य जल
अर्पण करना चाहिए-
ॐ सर्वतीर्थ समूदभूतं पाद्यं गन्धदिभिर्युतम्।
अनिष्ट हर्त्ता गृहाणेदं भगवन शनि देवताः।।
भगवान शनिदेव की पूजा में इस मंत्र को पढ़ते
हुए उन्हें आसन समर्पण करना चाहिए-
ॐ विचित्र रत्न खचित दिव्यास्तरण संयुक्तम्।
स्वर्ण सिंहासन चारू गृहीष्व शनिदेव पूजितः।।
इस मंत्र के द्वारा भगवान श्री शनिदेव
का आवाहन करना चाहिए-
श्री हनुमान चालीसा का नित्य पाठ
करना भी शनि दोष शान्ति का उत्तम
उपाय है।
नीलाम्बरः शूलधरः किरीटी
गृध्रस्थित स्त्रस्करो धनुष्टमान् |
चतुर्भुजः सूर्य सुतः प्रशान्तः
सदास्तु मह्यां वरदोल्पगामी ||
🌹 शनि गायत्री...
ॐ सूर्य पुत्राय विद्महे ।
मृत्युरुपाय धीमहि
तन्न: शनि: प्रचोदयात ।।
🌹
महेंद्रभाई रावल
संयोजक
शब्द संवाद
गुजरात
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